अनंत मिश्रा जी की कविताएं

पवित्रता

नींद खुली सुबह तो कुछ अजीब कश्म-कश था;

संवर के वो सपने मे जब आई

वो अतुलनीय श्रंगार-रस था |

ह्रदय से देखा उस श्रंगार को

क्योकि नयन बंधे थे परहेज से;

विंदिया उसके माथे पे चमक रही थी तेज से |

अपलक देखना उसका

दिल की धड़कन बढाता था;

काजल उसके नयन सौन्दर्य में

चार-चांद लगाता था |

क्रोध था या शर्मो-हया थी

उस लाल चेहरे ने उलझाया बहुत;

नयन प्रेम-निमंत्रण पाकर

मैं भी इठलाया बहुत |

था रोम-रोम प्रसन्न

उससे मित्रता ज़्यादा करके;

ह्रदय ने कहा अब खोलो नयन

पवित्रता का वादा करके |

~~~~~~~~~~~~~~~ (अनन्त)

उड़ान की सीमा

जब पता है मंजिल तो,

दरबदर क्यू फिरते है?

जब उठना आ ही गया तो,

बार बार हम क्यों गिरते है?

बहुत मुश्किल से सीखा है,

नभ मे उड़ने का अंदाज।

खुश रहने लगा हूं मै भी अब,

कुछ बातों को करके नजरअंदाज।।

माना पंखों मे हुनर है उड़ने का,

पर भरोसा, हमको हमीं पर है।

उड़ता हूं लेकिन, अपनी औकात में,

क्योकि मेरा पैर, सदा जमीं पर है।।

(अनन्त)

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