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अंधेरे में’ मुक्तिबोध की लंबी कविता

‘अंधेरे में’ मुक्तिबोध की लंबी कविता है। पीड़ा, दुःख-दर्द, भीतरी संत्रास, मौन आक्रोश, उद्वेलन, दबा विद्रोह, घुटन, घबराहट, भय, मानसिक दोहन, अर्थाभाव और असुरक्षा से आतंकित स्थिति, भविष्य और वर्तमान की चिंताएं, लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर फैला घना अंधेरा, असंमजस, निराशाभरा माहौल, अमानवीय और दोहित शोषित स्थितियों का बखान, सपनों का टूटना और भ्रमों का भंग होना, संसदीय व्यवस्था के ऊपर का भरौसा टूटना, पूंजीवादिता, धर्म, वर्ण और जातिवाद के तहत निर्मित भयानक स्थितियां, मूल्यों का पतन, लूट और मक्कारी के चलते रोजमर्रा के लिए रोटी के लाले पड़ना, तिकड़मबाजी, मशाल को बार-बार जलाने की कोशिश में बूझने का दुःख, धुंधलापन, धुसरता, विवशता, मजबुरियां... और भी बहुत कुछ है इस कविता में। जिसे, पढ़ सुन, देख अपना मन आतंकित होता है और एक घने काले अंधेरे में खो जाता है। जिन स्थितियों में इसे कवि ने लिखा वह रिस-रिसकर कविता में उतरी है। इस कविता में ही नहीं तो मुक्तिबोध की बाकी रचनाओं में भी यहीं भाव बार-बार उभरकर उठ जाते हैं



जिंदगी के...

कमरों में अँधेरे

लगाता है चक्कर

कोई एक लगातार;

आवाज पैरों की देती है सुनाई

बार-बार... बार-बार,

वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता,

किंतु वह रहा घूम

तिलस्मी खोह में गिरफ्तार कोई एक,

भीत-पार आती हुई पास से,

गहन रहस्यमय अंधकार ध्वनि-सा

अस्तित्व जनाता

अनिवार कोई एक,

और मेरे हृदय की धक्-धक्

पूछती है - वह कौन

सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई !

इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से

फूले हुए पलस्तर,

खिरती है चूने-भरी रेत

खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह -

खुद-ब-खुद

कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,

स्वयमपि

मुख बन जाता है दिवाल पर,

नुकीली नाक और

भव्य ललाट है,

दृढ़ हनु

कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।

कौन वह दिखाई जो देता, पर

नहीं जाना जाता है !

कौन मनु ?


बाहर शहर के, पहाड़ी के उस पार, तालाब...

अँधेरा सब ओर,

निस्तब्ध जल,

पर, भीतर से उभरती है सहसा

सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति

कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है

और मुसकाता है,

पहचान बताता है,

किंतु, मैं हतप्रभ,

नहीं वह समझ में आता।


अरे ! अरे !!

तालाब के आस-पास अँधेरे में वन-वृक्ष

चमक-चमक उठते हैं हरे-हरे अचानक

वृक्षों के शीशे पर नाच-नाच उठती हैं बिजलियाँ,

शाखाएँ, डालियाँ झूमकर झपटकर

चीख, एक दूसरे पर पटकती हैं सिर कि अकस्मात् -

वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुई किसी एक

तिलस्मी खोह का शिला-द्वार

खुलता है धड़ से



घुसती है लाल-लाल मशाल अजीब-सी

अंतराल-विवर के तम में

लाल-लाल कुहरा,

कुहरे में, सामने, रक्तालोक-स्नात पुरुष एक,

रहस्य साक्षात् !!


तेजो प्रभामय उसका ललाट देख

मेरे अंग-अंग में अजीब एक थरथर

गौरवर्ण, दीप्त-दृग, सौम्य-मुख

संभावित स्नेह-सा प्रिय-रूप देखकर

विलक्षण शंका,

भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात्

गहन एक संदेह।


वह रहस्यमय व्यक्ति

अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है

पूर्ण अवस्था वह

निज-संभावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की,

मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव,

हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,

आत्मा की प्रतिमा।


प्रश्न थे गंभीर, शायद खतरनाक भी,

इसी लिए बाहर के गुंजान

जंगलों से आती हुई हवा ने

फूँक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी -

कि मुझको यों अँधेरे में पकड़कर

मौत की सजा दी !


किसी काले डैश की घनी काली पट्टी ही

आँखों में बँध गयी,

किसी खड़ी पाई की सूली पर मैं टाँग दिया गया,

किसी शून्य बिंदु के अँधियारे खड्डे में

गिरा दिया गया मैं

अचेतन स्थिति में !


2


सूनापन सिहरा,

अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभरे,

शून्य के मुख पर सलवटें स्वर की,

मेरे ही उर पर, धँसाती हुई सिर,

छटपटा रही हैं शब्दों की लहरें

मीठी है दुःसह !!

अरे, हाँ, साँकल ही रह-रह

बजती है द्वार पर।

कोई मेरी बात मुझे बताने के लिए ही

बुलाता है - बुलाता है

हृदय को सहला मानो किसी जटिल

प्रसंग में सहसा होठों पर

होठ रख, कोई सच-सच बात

सीधे-सीधे कहने को तड़प जाय, और फिर

वही बात सुनकर धँस जाय मेरा जी -

इस तरह, साँकल ही रह-रह बजती है द्वार पर

आधी रात, इतने अँधेरे में, कौन आया मिलने?

विमन प्रतीक्षातुर कुहरे में घिरा हुआ

द्युतिमय मुख - वह प्रेम भरा चेहरा -

भोला-भाला भाव -

पहचानता हूँ बाहर जो खड़ा है

यह वही व्यक्ति है, जी हाँ !

जो मुझे तिलस्मी खोह में दिखा था।

अवसर-अनवसर

प्रकट जो होता ही रहता

मेरी सुविधाओं का न तनिक खयाल कर।

चाहे जहाँ, चाहे जिस समय उपस्थित,

चाहे जिस रूप में

चाहे जिन प्रतीकों में प्रस्तुत,

इशारे से बताता है, समझाता रहता,

हृदय को देता है बिजली के झटके

अरे, उसके चेहरे पर खिलती हैं सुबहें,

गालों पर चट्टानी चमक पठार की

आँखों में किरणीली शांति की लहरें

उसे देख, प्यार उमड़ता है अनायास!

लगता है - दरवाजा खोलकर

बाँहों में कस लूँ,

हृदय में रख लूँ

घुल जाऊँ, मिल जाऊँ लिपटकर उससे

परंतु, भयानक खड्डे के अँधेरे में आहत

और क्षत-विक्षत, मैं पड़ा हुआ हूँ,

शक्ति ही नहीं है कि उठ सकूँ जरा भी

(यह भी तो सही है कि कमज़ोरियों से ही लगाव है मुझको)

इसीलिए टालता हूँ उस मेरे प्रिय को

कतराता रहता,

डरता हूँ उससे।

वह बिठा देता है तुंग शिखर के

खतरनाक, खुरदरे कगार-तट पर

शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको।

कहता है - "पार करो पर्वत-संधि के गह्वर,

रस्सी के पुल पर चलकर

दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो"

अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा,

मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से

बजने दो साँकल!!

उठने दो अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले,

वह जन - वैसे ही

आप चला जायेगा आया था जैसा।

खड्डे के अँधेरे में मैं पड़ा रहूँगा

पीड़ाएँ समेटे !

क्या करूँ क्या नहीं करूँ मुझे बताओ,

इस तम-शून्य में तैरती है जगत्-समीक्षा

की हुई उसकी

(सह नहीं सकता)

विवेक-विक्षोभ महान् उसका

तम-अंतराल में (सह नहीं सकता)

अँधियारे मुझमें द्युति-आकृति-सा

भविष्य का नक्शा दिया हुआ उसका

सह नहीं सकता !

नहीं, नहीं, उसको छोड़ नहीं सकूँगा,

सहना पड़े - मुझे चाहे जो भले ही।


कमज़ोर घुटनों को बार-बार मसल,

लड़खड़ाता हुआ मैं

उठता हूँ दरवाजा खोलने,

चेहरे के रक्त-हीन विचित्र शून्य को गहरे

पोंछता हूँ हाथ से,

अँधेरे के ओर-छोर टटोल-टटोलकर

बढ़ता हूँ आगे,

पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव,

हाथों से महसूस करता हूँ दुनिया,

मस्तक अनुभव करता है, आकाश

दिल में तड़पता है अँधेरे का अंदाज,

आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगतीं,

केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी।

आत्मा में, भीषण

सत्-चित्-वेदना जल उठी, दहकी।

विचार हो गए विचरण-सहचर।

बढ़ता हूँ आगे,

चलता हूँ सँभल-सँभलकर,

द्वार टटोलता,

जंग खायी, जमी हुई जबरन

सिटकनी हिलाकर

जोर लगा, दरवाजा खोलता

झाँकता हूँ बाहर...

सूनी है राह, अजीब है फैलाव,

सर्द अँधेरा।

ढीली आँखों से देखते हैं विश्व

उदास तारे।

हर बार सोच और हर बार अफसोस

हर बार फ़िक्र

के कारण बढे हुए दर्द का मानो कि दूर वहाँ, दूर वहाँ

अँधियारा पीपल देता है पहरा।

हवाओं की निःसंग लहरों में काँपती

कुत्तों की दूर-दूर अलग-अलग आवाज,

टकराती रहती सियारों की ध्वनियों से।

काँपती हैं दूरियाँ, गूँजते हैं फासले

(बाहर कोई नहीं, कोई नहीं बाहर)


इतने में अँधियारे सूने में कोई चीख गया है

रात का पक्षी

कहता है -

"वह चला गया है,

वह नहीं आएगा, आएगा ही नहीं

अब तेरे द्वार पर।

वह निकल गया है गाँव में शहर में !

उसको तू खोज अब

उसका तू शोध कर!

वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति,

उसका तू शिष्य है (यद्यपि पलातक...)

वह तेरी गुरु है,

गुरु है..."


3


समझ न पाया कि चल रहा स्वप्न या

जागृति शुरू है।

दिया जल रहा है,

पीतालोक-प्रसार में काल चल रहा है,

आस-पास फैली हुई जग-आकृतियाँ

लगती हैं छपी हुई जड़ चित्राकृतियों-सी

अलग व दूर-दूर

निर्जीव !!

यह सिविल लाइन्स है। मैं अपने कमरे में

यहाँ पड़ा हुआ हूँ

आँखें खुली हुई हैं,

पीटे गये बालक-सा मार खाया चेहरा

उदास इकहरा,

स्लेट-पट्टी पर खींची गयी तसवीर

भूत-जैसी आकृति -

क्या वह मैं हूँ ?

मैं हूँ ?