कवि कोकिल

विद्यापति मिथिला के कवि शिरोमणी है "देसिल बयना सब जन मिट्ठआ" यह रच कर उन्होंने मिथिला के सभी क्षेत्रों को एक सूत्र में पिरोया और एक रूप बनाया उन्हें कवि कोकिल कहा जाता है उनके गीतिकाव्य का लोहा पूरा साहित्य जगत मानता है

10वीं 11वीं शताब्दी में मातृका छंदों में रचनाएं होने लगी थी जयदेव का गीत गोविंद उसी समय लिखा गया था विद्यापति की भी रचनाएं उसी प्रकार से लिखी गई उस समय बंगाल उड़ीसा और सुदूर पश्चिम में भी इसी प्रकार की मात्रिक छंदों में पदावली लिखी जा रही थी हिंदी में और खासकर मैथिली में विद्यापति गीतिकाव्य परंपरा के प्रणेता के रूप में उभरे उनकी पदावली की रचनाएं लोगों के मन के और भावनाओं के बहुत करीब रही जनमानस ने पदावली की सरल सहज और अविरल अभिव्यक्ति को बहुत पसंद किया विद्यापति की पदावलियों में प्रेम भक्ति श्रृंगार और आध्यात्मिकता सभी का समावेश है अपनी रचनाओं के कारण विद्यापति मैथिल कोकिल कहलाए विद्यापति जनकवि थे और उनकी भाषा मैथिली रही उन्होंने अपनी पदावली से जन चेतना, जन सरोकार ,भावनात्मक उत्कर्ष तथा अनुभूति की सूक्ष्मता का परिचय दिया विद्यापति की गीतिकाव्य अपने विशेष साहित्यिक रूप के कारण जनमानस की आत्मा में बस गया उनकी पदावली में एक सुंदर लय रहा और मधुर संगीत रही विद्यापति ने मिथिला की संस्कृति को अपने काव्य में उभरा और सामान्य जनजीवन के आचार व्यवहार की बातों को भी उन्होंने अपनी पदावली का हिस्सा बनाया जिस कारण विद्यापति की पदावली जनमानस को बहुत लुभा गई

विद्यापति की गीती काव्य से समकालीन अन्य कवि प्रभावित हुए जैसे कि गोविंद दास हरिदास सूरदास यहां तक कि निराला तक के काव्य पर भी उनके गीतिकाव्य का असर आस पास की अन्य क्षेत्रीय भाषी काव्यों पर भी पड़ा जैसे बंगाल पर प्रभाव के फल स्वरूप ब्रजबूली का विकास हुआ उसी प्रकार असम में वरगीत अंकियानाट आदि पर विद्यापति के गीतों का स्पष्ट असर देखा जा सकता है

गीतिकाव्य की कोई सटीक परिभाषा नहीं बन पाई है। ऐसा माना जाता है कि मुक्तक पद में और भावना की तीव्र अभिव्यक्ति हो और घटना प्रभाव संक्षिप्त हो जिसे बाद्य यंत्रों पर गाया जा सके उन्हें गीतिकाव्य कहा जा सकता है

गीतिकाव्य में एक खास भावना का चित्रण किया जाता है गीतिकाव्य में एक नई बात को कह कर उसे पूर्व में कही बात से जोड़ दिया जाता है विद्यापति की पदावलीयों में इसी तरह के गुण देखे गए

वैदिक काल में गीतिकाव्य की उत्पत्ति हुई थी या नहीं यह तो कहना मुश्किल है लेकिन उस समय की रचनाओं को गाकर सुनाया जाता था हिन्दी के गीतिकाव्य के पहले रचनाकार के रूप में विद्यापति का ही नाम आता है विद्यापति की पदावलियां लीला गान की परंपरा के अनुरूप है उनकी पदावली जनमानस के बहुत करीब रही है उन्होंने गीतिकाव्य के रूप में पदावली की रचना मुक्तक शैली को अपनाया और रचनाओं के भाव अपने आप में पूर्ण व स्वतंत्र रहे उनकी रचनाओं में राधा कृष्ण के प्रेम का सुन्दर चित्रण हुआ संगीतात्मकता और कोमल कान्त पदावली के लिए विद्यापति की पदावली प्रसिद्ध है विद्यापति की पदावली के काव्य तत्व और गेय तत्व को अलग कर पाना मुश्किल है वह एक दूसरे के पूरक हैं भावों की तीव्रता और शब्दों की संक्षिप्तता का विद्यापति के गीतों की विशेषता है अपने गुणों के कारण विद्यापति की पदावली एक श्रेष्ठ गीतिकाव्य है

जहां एक और महाकवि विद्यापति की पदावली में आम लोगों की भावनाओं उस समय की समाज की चिंता और समाज सुधार की भावनाएं तथा कोमल मानवीय भावनाओं आदि का सूक्ष्म चित्रण मिलता है वही लोकभाषा में लिखे जाने के कारण यह आज भी बहुत ही दिल के करीब है वहीं दूसरी ओर संस्कृत में रचनाएं करके विद्यापति ने अपने पांडित्य का भी लोहा मनवाया विद्यापति की पदावली मुख्यत: दो तरह की रही एक भक्ति परक और दूसरा प्रेम परक भक्ति परक रचना विद्यापति को किसी एक संप्रदाय से बांधा नहीं सकता उन्होंने शिव, शक्ति ,वैष्णव हर तरह की संप्रदायों के तहत भक्तिपरक काव्य की रचना की विद्वानों की बात हो या चूल्हे चौके की बात हो गृहस्ती की बात हो या साधु-संतों की बात हो भक्तों की बात हो पुजारियों की बात हो या प्रेमी प्रेमिकाओं की पढ़ाई की बात हो विद्यापति के गीत हर भाव में अपनी प्रसिद्धि पाते हैं, प्रशंसा पाते हैं और बड़े ही मनोहारी होते हैं विद्यापति की गीतिकाव्य की पदावली से ऐसा जान पड़ता है कि उन्हें संगीत शास्त्र का अच्छा ज्ञान था

गीती काव्य के रूप में विद्यापति की पदावली की विशेषताएं बताने के लिए तीन प्रकार के पदों में विभाजित किया जाता है

राधा-कृष्ण संबंधी पद इन पदों में रतिक्रीड़ा नख शिख वर्णन संयोग वर्णन विरह वर्णन आदि सारे रीतिकालीन काव्य के लक्षण विद्यापति ने प्रदर्शित किए

शिव विष्णु गंगा जानकी दुर्गा आदि की स्तुति परख पदों में विद्यापति का भक्ति भाव स्पष्ट दिखाई पड़ा

आश्रय दाता राजाओं की स्तुति भरे पदों में उनकी वीरताओं का गुणगान किया

आसानी से गाया जा सकने के कारण और सरल भाषा और लोगों के जीवन के बहुत करीब होने के कारण जहां बहुत बड़े-बड़े विद्वान विद्यापति के पदों को गाते हैं वहीं एक खेतिहर मजदूर भी उनकी पदों को उसी तन्मयता से गाता और समझता है

मैथिली में रची गई विद्यापति के पद इतनी मधुर और सरल संगीत में है कि उन्हें शास्त्रीय गायन के विद्वान जितने लय में गाते हैं दूसरी तरफ एक संगीत के ज्ञान से अछूता इंसान भी उसे उतनी ही आत्मीयता से गाता है और सुख पाता है क्योंकि विद्यापति के पदों में लय ताल छंद मात्रा की कोई भी त्रुटि दिखाई नहीं देती

विद्यापति का एक गीत है "

कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ"

इस गीत को किसी भी समय में किसी भी धुन में किसी भी मौके पर लोग उतनी ही लयबद्ध और तन्मयता से संगीत में होकर गा लेते हैं जितनी तन्मयता से विद्यापति ने अपने गीतों को डूब कर लिखा होगा उतनी ही तन्मयता से डूब कर पाठक उसे पढ़ते हैं स्रोता उसकी भावनाओं में डूबते हैं और गायक उसे गाते हुए उसके रस में डूब जाते हैं विद्यापति की किसी भी प्रकार की पदावली हो चाहे वह भक्ति परक ,श्रृंगार परक , शक्ति वंदना ,स्तुति ,शिव नचारी ,विरह विलाप या मिलन सुख हो हर भाव में यह जनमानस को अपना बना लेता है

पावस की रात में जब मेघ बरस रहा है और एक विरहनी का चित्र विद्यापति करते हैं और उनकी पदावली "

सखी है हमर दुखक नहीं और"

गीत लिखते हैं तो इसमें किसी भी तरह की कामुकता नहीं दिखती है इसमें पीड़ा सहती प्रेम रंग में रंगी एक तपस्विनी की व्यथा छुपी हुई है जिसको सुनकर या पढ़कर उस दृश्य में पाठक खो जाते हैं

विद्यापति की गीतिकाव्य को पढ़ते हीं पाठकों के मन मस्तिष्क में संगीत बज उठता है उसके उच्चारण मात्र से ही ऐसा लगता है कि कोई बाधयंत्र बज उठा हो एक मादक संगीत मन में चलने लगता है और खुद ब खुद उनकी पदावली का गान शुरू हो जाता है

विद्यापति के गीत लोक गीतों के बहुत करीब हैं और शास्त्रीयता भी उसमें है ।कई पदावलीयों के शीर्षक में रागों का नाम लिखा हुआ है कि यह गीत किस राग में गाया जाएगा जैसे मालव धनाक्षरी, सामरी ,अहिरानी, केदार ,कानड़ा आदि आदि

विद्यापति की पदावली यहां जनमानस के बेहद करीब है। सामाजिक रीति रिवाज के लिए उन्होंने गीत लिखा जैसे उपनयन, विवाह, मुंडन, पूजा-पाठ, कीर्तन, भजन ,सोहर ,जन्म मरण आदि आदि।

विद्यापति के गीतों के पद संगीत में होते हैं, नाद संगीत और भाव संगीत की ऐसी ताकत भरी हुई होती है कि जो लयहीन मनुष्य हो या जिसे संगीत का जरा भी ज्ञान ना हो वह भी अगर इन पदों को पढ़ना शुरू करें तो वह स्वयं ही धुन और लय में उसके मुख से संगीत बनकर निकलने लगता है

विद्यापति के पद जनमानस के और आचार व्यवहार के इतने करीब है कि उनके पद कब कहावत बन गए और मुहावरे बन गए और साहित्य के एक अंग बन गए यह बता पाना मुश्किल है जैसे कि कोई मेहमान आने पर कौवे का मुंडेर पर बोलना एक संकेत माना जाता है उसी तरह विद्यापति के एक गीत में

"मोरा रे अंगनवा चंदन केरि गछिया

ताहि चढ़ी कुररय काग रे "

यह पंक्तियां उन्होंने रची है ।

विद्यापति के भाव बड़े ही शांत सौम्य और पवित्र रहे कोई भी अशांति नहीं अभद्रता नहीं है कोई भी उच्श्रृंखलता नहीं दिखीती

प्रेम विरह की आग में तपता है और तब उसकी चमक पाठकों को भावुक करती है और यही असर विद्यापति ने अपने पदावली में दिखाया विद्यापति के कविताओं में आत्मिक भावों का बेजोड़ चित्रण मिलता है

विद्यापति के काव्य को किसी एक दिशा का काव्य नहीं कहा जा सकता उनके काव्य में जीवन के अनेक अनुभव समाए हुए हैं चाहे वह भक्ति प्रधान गीत हो या श्रृंगार प्रधान गीत। वे एकेश्वरवाद नहीं रहे नाही श्रृंगार कि उनकी रचनाओं में किसी भी तरह की अभद्रता नजर आती है जबकि उनकी रचनाओं में जहां कवि पूरी तरह से डूबा हुआ रसिक है वही भक्ति में समर्पण की पराकाष्ठा उन्होंने दिखाई है श्रृंगार में भी श्रृंगार की अनेक धाराओं को उन्होंने अपनी कविताओं से जिवंत किया है और जीवन के अनेक अनुभवों को उन्होंने बहुत ही विराट पटल पर दर्शाया है

विद्यापति की श्रृंगार पदावली भक्ति काल के पहले तक बहुत प्रबल रही भक्ति काल के आते-आते और उनके प्रिय मित्र शिव सिंह की मृत्यु के पश्चात विद्यापति की पदावलियों में ज्यादातर भक्ति परक रचनाएं ही रही परंतु यह भी हुआ कि विद्यापति के मैथिली में लिखे राधा कृष्ण प्रेम विषयक गीतों को कृष्ण भक्त भक्ति गीत के रूप में भी गाते हैं

बहुत सी विद्यापति की पदावली को श्रृंगार रस और प्रेम विरह की ना मानकर अगर उन्हें आध्यात्मिक की दृष्टि से देखा जाए तो पता चलता है कि भक्ति में जिस तरह से एक भक्त व्याकुल और विकल होता है वह उसी समान होता है जैसे कि प्रेम में एक प्रेमी और प्रेमिका इसीलिए विद्यापति की पदावली के अर्थ को समझने पर उनमें आत्मा परमात्मा के मिलन की बात प्रकट होती है भक्ति परक पदावलीयों में विद्यापति ने लौकिक जीवन के प्रेम विरह आदि को व्यर्थ बताते हुए ईश्वर के प्रेम को श्रेष्ठ बताया है विद्यापति एक रचनाकार थे जो दो काल खंडों को अपनी रचनाओं में समेटा एक मन होते हुए उन्होंने दो मन:स्थितियों को दर्शाया




विद्यापति ने अपने सभी पदावली यों को लगभग मैथिली भाषा में ही लिखा उन्हें अपनी भाषा पर इतना सम्मान था आश्वस्त इतना उनमें आत्मविश्वास था कि उन्होंने अपनी पुस्तक कीर्तिलता में घोषणा कर दी कि

बालचंद विज्जवइ भाषा।

दुहु नहि लग्गइ दुज्जन हासा।

उन्होंने कविता को समझने के विषय में कहा कि कुसुम के मधु का स्वाद भंवरा ही जान सकता है उसी तरह कविता के रस का स्वाद और उसका मर्म एक कविता की कला का पारखी ही जान सकता है

भाषा के संबंध में विद्यापति ने अपनी एक पदावली में लिखा कि संस्कृत बुद्धिजीवियों की भाषा है लेकिन प्रकृति को और भावनाओं को अगर समझना है और जो भी आप कहें वह बात मीठी लगे किसी को तो उसके लिए बहुत जरूरी है कि आप जन भाषा में ही लिखें और इसीलिए मैं जन भाषा में लिखता हूं

मैथिली भाषा विद्यापति के समय में बड़ी ही संपन्न भाषा थी इसका पता ज्योतिश्वर ठाकुर रचित वर्णरत्नाकर से पता चलता है और यही मैथिली विद्यापति की मातृभाषा दी थी कीर्तिपताका भी विद्यापति ने मैथिली में ही लिखी

विद्यापति ने अपनी पदावलिओं में भाव को व्यक्त करने के लिए बहुत ही खूबसूरती से बिंबो और प्रतीकों का उपयोग किया उन्होंने अलंकार विधान की भी दृष्टि से उत्कृष्ट रचनाएं की विरह मिलन प्रेम श्रृंगार की रचनाओं में राधा कृष्ण के वर्णन में उन्होंने बहुत ही खूबसूरत बिंबो को उकेरा विद्यापति ने परंपरागत उपमाओं का तो प्रयोग किया है साथ ही साथ उन्होंने उपमानो का भी सृजन किया

विद्यापति ने अपने गीतों में ऐसी संप्रेषण शक्ति डाली है जो श्रोताओं को अपने में डूबा लेती है उस गीत को गाने वाले और सुनने वाले ऐसे उस में खो जाते हैं कि वह उसके बंधन से निकल ही नहीं पाते और उन दृश्यों के साथ खुद को एकसार कर लेते हैं विद्यापति की पदावलियों को गाने और सुनने वाले उसे अपने जीवन की एक घटना मान लेते हैं जिससे कि उनकी पदावलियां जीवंत हो उठती हैं विद्यापति ने अपनी पदावलिओं में बोलचाल की भाषा रखी और वहां के लोगों के बीच जो लोकोक्तियां और मुहावरे प्रयोग में लाए जाते थे आए दिन बोलचाल में उनको अपनी पदावली ओं में स्थान दिया छोटा है कि महाकवि श्रेष्ठ कला कौशल और श्रेष्ठ प्रतिभा वाले रचनाकार थे जीवन में व्याप्त जो घटनाएं हमेशा घटित होती रहती है वह कभी भी हो तो आज भी वहां के जनपद में लोग विद्यापति की पदावलिओं में ही बोल उठते हैं

मोरा रे अंगनवा चनन केर गछिया

या

पिया मोरा बालक हम तरुणी गे

विद्यापति की पदावलिओं में सिर्फ मैथिली ही नहीं बल्कि संस्कृत अपभ्रंश वज्र भाषा नेपाली बंग प्रांतीय उड़िया असमिया मगही भोजपुरी जैसी भाषाओं का भी प्रयोग हुआ है

विद्यापति ने अपने क्षेत्र से बाहर निकल कर के भी भ्रमण किया और इस भ्रमण की पदावलियां उन्होंने भू परिक्रमा नामक पुस्तक में लिखी और अपनी लिखने की प्रति पदावली के प्रति और भाषा के प्रति कवि के आदर का इसी बात से पता चलता है कि उन्होंने जहां भी भ्रमण किया और जहां के बारे में भी लिखा उन्होंने वहां की भाषा का प्रभाव अपनी पदावलिओं में बड़ी ही अनुशासनशीलता से दिखाया शायद यही कारण रहा होगा कि हाल हाल तक विद्यापति को बंगाल अपना रचनाकार मानता रहा

इसका यही परिणाम हुआ कि मिथिला राज्य के आसपास के क्षेत्र जो अन्य भाषा भी बोलते थे लेकिन उनके ऊपर भी मिथिला की भाषा का प्रभाव विद्यापति के कारण पड़ने लगा ज्यादा इसका प्रभाव बंगाली कवियों की काव्य रचना पर पड़ा ऐसा माना जाता है कि कवि सम्राट रविंद्र नाथ ठाकुर पर भी उनका प्रभाव पड़ा लेकिन इसके ऊपर अभी कोई अनुसंधान नहीं हुआ है


महाकवि विद्यापति की भाषा उनके काव्य लिखने का शिल्प और जिस परंपरा से वह काव्य लिखते थे वह इतनी सशक्त थी कि मिथिला ही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर भारत के पूरे रचनाकारों की प्रक्रिया पर उसका प्रभाव पड़ा वैसे तो राधा कृष्ण के प्रेम पर रचनाएं विद्यापति से पहले भी हुआ करती थी परंतु विद्यापति ने इस पर अपने गीतों के माध्यम से ऐसा असर डाला कि उनका प्रभाव उस समय कि राधा कृष्ण संबंधित सभी रचनाओं पर देखने को मिलता है

पति ने प्रेम की उत्कंठा मिलन के लिए उत्सुकता विरह में वित्त होना और व्याकुल हो जाना मिलकर भी संतुष्ट ना होना जैसे कई भावों को विद्यापति ने अपनी रचनाओं में रचा और इस तरह के भावों को अन्य रचनाकारों ने भी विद्यापति की ही तरह से हीं रचने की कोशिश की

काफी समय तक मिथिला में भी जितने भी कवि विद्यापति के बाद हुए लगभग सभी ने विद्यापति की ही परंपरा को आगे बढ़ाया जैसे गोविंद दास उमापति रत्नपाणि हर्षनाथ हरिदास महाराज महेश ठाकुर लोचन प्रभृति आदि कुछ कवियों ने तो अपनी कविताओं में विद्यापति के नाम को जोड़े रखा

अनुसंधानकर्ताओं ने यहां तक कह दिया कि सूर्य की पदावली यों में भी विद्यापति का प्रभाव दिखाई पड़ता है मिथिला बंगाल आसाम उड़ीसा नेपाल की बात नहीं है विद्यापति के रचनाओं का प्रभाव अन्य भाषाओं पर भी पड़ा

हिंदी कविता पर तू विद्यापति का प्रभाव कुछ ज्यादा ही पड़ा भक्ति काल में कृष्ण भक्ति गीत पदावलियों पर और रीतिकाल में श्रृंगार परक कविताओं पर विद्यापति का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है

हिंदी साहित्य के कुछ कवियों ने जैसे दिनकर और निराला ने विद्यापति की कविताओं के प्रति अपना आकर्षण दिखाया और कहा कि वह उनके पसंद के कवि हैं

निराला जी की एक कविता

नवगीत नव लय ताल छंद नव

विद्यापति के कविता

नव वृंदावन नव नव तरुगन

के समान ही छंद अलंकार शब्दों की पूर्ण आवृत्ति ध्वनियों के उतार-चढ़ाव भाव की एकरसता के साथ रचे गए हैं

विद्यापति जीवन के सौंदर्य को भोग भी रहे थे वह जीवन में सौंदर्य की रचना कर रहे थे उन्होंने अपनों से लोगों को ऐसा चित्रण किया कि वे एक अनुशासित और बेहद ही सकारात्मक दृष्टि से चीजों को अपने आसपास देख पाते थे उनके मन की प्रवृत्ति भी विद्यापति की पदावलियों के अनुसार है बड़ी सौम्य हुई अपनी भक्ति की पदावलिओं में विद्यापति ने जो समर्पण दिखाया उनको आज भी गाते समय लोग भक्ति में डूब जाते हैं और ईश्वर में तल्लीन हो जाते हैं


विद्यापति ने अपनी पदावलियों में ग्रामीण भाषा लोकोक्तियां बोलचाल के शब्द और उस जनपद के लोकाचार को इस तरह से रचा और उसे संगीत और प्रेम से पूर्ण बना दिया कि कि उनकी पदावलियां सामान्य जनों के जीवन के साथ एक रूप हो गई और वह प्राणवान हो गई


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