क्या यह पागलपन है?


अजीब सी पहेली है रिश्तों की। शायद इस पागलपन से सामना आप का भी हुआ हो। भावना कि धूप छांव में रिश्ते पलते हैं। रिश्तों को निभाते हुए कभी हम कुछ पाते हैं और कभी तो बहुत कुछ खो देते हैं।कहने को तो बहुत शिक्षक मिल जाएंगे जो रिश्तों की सबक सिखाने का दावा करेंगे और खुद फेल हो जाएंगे। मैंने उसी पहेली का एक बूंद लिया है "उम्मीद" और एक खास पल को उस बूंद में देखने की कोशिश की है

छन्ननन…….

हां यही आवाज आई थी

छन्नननन….

सुना था रानी ने

मुझे पता है तुम ने नहीं सुना होगा

छन्ननन. ...

बिल्कुल स्पष्ट……

साफ-साफ सुनाई पड़ी थी आवाज

उसने सुना था एक गाने में भी कि उसके टूटने की आवाज छन्न ही होती है

ऐसी हालातों की रानी अभ्यस्त हो चुकी थी ।उसने स्वीकार कर लिया था कि यह हालात जैसे हैं वैसे ही रहेंगे ।उसे अब दुखी होने का भी मन नहीं होता था ।दुखी होकर क्या करेगी । दूसरों की खुशी के लिए अपने को भी भुला देना ऐसा वह करती हीं क्यों थी ? जब की वह भी सपना संजोने लगती कि मेरे लिए भी कोई ऐसा हीं करेगा ।क्या इसलिए आज उसने एक दूसरा ही बहाना ढूंढ लिया था ? एक नई बात की उसने सपने के टूटने की आवाज सुनी है ।

ऐसा नहीं कि पहली बार कुछ टूटा था। इसके पहले भी कई बार टूट चुका है ,पर रानी ने शायद ध्यान नहीं दिया था ।

इस बार बड़े इत्मीनान से उसने सुना...

आवाज छन्न हीं थी।

हां , सच में छन्न की ही आवाज थी

टूट गया था वह ,एक सपना ही तो था ।

देखा है कभी शीशे को टूटते हुए ?

अनगिनत टुकड़ों में टूटता है शीशा

कुछ टुकड़े बड़े होते हैं कुछ छोटे-छोटे कुछ बेहद ही छोटे ।टूटे शीशों में अपनी शक्ल देखने की कोशिश तो करो।

जमीन पर बिखरे टूटे शीशे में तुम्हारा ही चेहरा दिखाई पड़ेगा और अनेकों चेहरे हर टुकड़े में उभर कर आएंगे ।

लेकिन पता है? सपना जब टूटता है तो वह शीशे की तरह नहीं टूटता ,आवाज इसकी जरूर शीशे के टूटने से मिलती-जुलती है लेकिन अंतर होता है ,जो उसने सुना।

हां बता तो रही थी इसी बार सुना था।

बड़े इत्मीनान से सुना कि वह शीशे की तरह नहीं टूटता वह सपना हीं था कुछ अलग तरह से टूटा।

उसे टूटते हुए बड़े इत्मीनान से आखिर रानी क्यों देख सुन रही थी पता है तुम्हें ?

इसके पहले जब सपने टूटते थे, तो बड़ी जल्दी जल्दी वह नए सपने बुन लेती थी या सपने की मरम्मत शुरू कर देती थी कि किसी तरह फिर से सपना ठीक हो जाए, सपना जिंदा होकर उसमें फिर से जीने लगे।

यह सब इतनी जल्दबाजी में वह करती थी कि भागती थी पूरी रफ्तार से और कभी याद ही नहीं रहा कि एक आवाज भी थी वहां ।उसने सुना हीं नहीं कि सपने के टूटने की आवाज छन्न होती है , परन्तु आज न जाने क्यों इत्मीनान से उसने उस आवाज को सुना?

पहले बहुत हिम्मत थी। हिम्मत उस उम्मीद की थी कि एक दिन उसके सपने जरूर पूरे होंगे क्योंकि वह उसके लिए प्रयास पूरी लगन से और समर्पण से करती रहती है। दूसरों के सपनों को पूरा करना और दूसरों को खुशियां देना चाहिए लेकिन बदले में दूसरे तुम्हारे सपनों को पूरा करेंगे कि नहीं तुम्हें खुशियां देंगे कि नहीं इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए और रानी ने यह पागलपन किया था कि वह दूसरों से उम्मीद कर बैठी थी।

बताते हुए बड़ी हंसी आ रही है, लेकिन यह सच्चाई है कि न जाने कितने सपने बुनते उनकी मरम्मत करते करते आज इस मुकाम पर वह पहुंच गई कि अब सपने बुनते रहने का और नए सपने की मरम्मत करने का सपना भी नहीं रहा है।

फिर भी आदत से मजबूर उसने बड़े दिनों बाद धीरे धीरे संभलते हुए पूरी सावधानी से एक और सपना बुना था ।बहुत सोच समझ कर बुना था वह सपना बहुत ही मजबूती से कोशिश की थी पिछली अपनी कई गलतियों से सबक लेकर ।

लेकिन टूट गया

वह भी टूट गया

बहुत ही जोर की आवाज गूंजी थी

हां उसने सुना था

छन्ननन…

यही आवाज थी

पता है ! उसके दिल में दर्द भी हुआ था उसके आंसू भी आए थे ।

थोड़े से आंसू नहीं थे

बहुत सारे आंसू थे

दोबारा उस सपने को समेटकर उसकी मरम्मत करने की हिम्मत ही नहीं थी शायद अब उसमें

और इतने सारे आंसू …..

लगता था जैसे आंसू उस टूटे सपने के हर एक टुकड़े को मिटा देंगे….

कैसी बेवकूफी है ना सपने तो बुन रही थी वह लेकिन वह उस की किरदार नहीं थी

इस सपने का किरदार कोई और था

सपने में जो कुछ भी होना था उसे नहीं करना था बल्कि उसके लिए दूसरे किरदार को करना था वैसा जैसा वह चाहती थी ।

यह कैसी बेवकूफी थी रानी की ।फिल्मों में भी तो डायरेक्टर जब तक बताता नहीं किरदार को कि उसे क्या करना है किरदार कैसे जानेगा कि अभी जो सीन होने वाला है उसमें उसे क्या करना है? उसका किरदार भी नहीं जानता था ।

आखिर रानी ऐसी गलती क्यों कर रही थी कि उसने किरदार को बताया भी नहीं था कि क्या करना है?

शायद इस पागलपन के वश में हीं उसने ध्यान से सुना था उस सपने के टूटने की आवाज को ।बिल्कुल, हां सच कह रही थी ,बिल्कुल छन्न यही आवाज थी ।

बड़े मजे की बात तो यह है कि उस किरदार को यह भी पता नहीं था कि वह कोई सपना उसके इर्द-गिर्द बुन रही है और जिसका किरदार वह है

सपना टूटा और टूटने की सजा भी रानी ने मुकर्रर कर लिया।

रानी को अभी भी नहीं पता कि सजा उसने किसको दी थी, उस किरदार को जो उसके सपने का था या कि खुद को ? रानी ने खुद को ही सजा दी थी ।सही किया था रानी ने, जब गलती रानी ने की तो सजा भी उसे ही मिलनी चाहिए।

उसने उस किरदार से बातचीत बंद कर ली, उसको अपने मन ही मन गुनहगार मान लिया।सपनों के टूटने का गुनहगार उसे ठहरा दिया जो जानता भी नहीं था कि सपना बुना जा रहा है जिसका किरदार वह है । यही कारण था कि रानी को ही सजा मिलनी चाहिए।

बहुत कोशिशों के बाद वह किरदार रानी तक पहुंचा और कारण जानना चाहा कि क्या बात है, क्या खता हुई है और वह गुनहगार क्यों हो गया है ?

रानी ने जरा भी देर नहीं की और उसको सच्चाई बता दी।

“शीशे का टूटना जानते हो ?हां !जानते होगे, तो पता है सपने भी शीशे की तरह ही टूटते हैं।”

फिर भी उसे कुछ समझ में नहीं आया वह आश्चर्य से देखता रहा ।

कैसा सपना ?

कौन सा सपना ?

उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था ।हां, उसे झुंझलाहट बहुत हो रही थी ।ऐसा लग रहा था जैसे रानी पागल हो और वह किसी पगली से बात कर रहा हो । भावनात्मक रूप से रानी पागल ही तो थी। आप अपने मन की जान सकते हैं परंतु कोई आदमी आपके कितने भी करीब क्यों ना हो आप यह दावा नहीं कर सकते हैं कि आप उसके मन को अपने अनुसार पा सकेंगे ।

अब उसकी समझ में बात नहीं आ पा रही थी। समझ वह रानी को पागल रहा था परंतु अब उसकी हरकतें पागलों की तरह लगने लगीं ।

बिना समय गंवाए रानी ने झट से कहा ..“सुनो आज तुम्हें मुझे समय देना था, खास दिन था आज “ ,और रानी के इतना कहते हीं एक सन्नाटा उन दोनों के बीच छा गया। रानी तो बस अब इंतजार कर रही थी वह क्या प्रतिक्रिया देगा।

क्यों कि जो बीता था वह कुछ यूं रहा कि रात 9:00 बजे रानी कुछ अजीब अजीब सी बातें कर के से उसे यह खास दिन याद दिलाने की कोशिश की थी उसे याद नहीं आया था हां बस झल्लाया जरूर था अजीब बातों से

10:00 बजे रात और एक कोशिश हुई विचित्र बातें की वह और भी झल्लाया

11:00 बजे रात बिल्कुल ही पागलों जैसी हरकत की गई उसे याद नहीं आया लेकिन वह बहुत ही झल्लाया

12:00 बज गए…... 12:01 …… 12:02 मिनट पर मिनट बीता जा रहा था लेकिन रानी को कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली

12:30 बजे फिर कुछ अजीब सी हरकत की गई इस उम्मीद में कि अब तो याद आ जाए उसे शायद

1:00 बज गए 1:30 बज गए 2:00 बज गए 2:30 बज गए

सन्नाटा छाया रहा और रानी ने इस सन्नाटे की चादर को खुद पर लपेट लिया ।

उसने एक बहुत ही खतरनाक सी चुप्पी साध ली। कितनी ही बार उसने बात करने की कोशिश की लेकिन रानी ने एक जवाब नहीं दिया ।देखते देखते पूरा दिन बीत गया फिर रात आ गई।फिर वही होता रहा

9:00 बजे रात चुप्पी थी वह बार-बार पूछ रहा था क्या हुआ

10:00 बजे रात वही हालत चुप्पी हीं थी और उसकी झुंझलाहट

11:00 बजे रात वही

12:00 बजे रानी ने चुप्पी तोड़ दी और कहा

“आज का खास दिन तुम्हे याद न रहा "

सन्नाटा …….

ऐसा लग रहा था उसे अफसोस हुआ है

अब शुरू हो चुका था सफाई देने का सिलसिला ।

लेकिन वह अभी भी खामोश थी

जिस तरह से सपने को टूटते समय इत्मीनान से उसकी आवाज सुनी थी रानी ने हां वही आवाज छन्न की आवाज हीं थी जो यह बता रहा था कि भावनात्मक स्तर पर वह कमजोर हो गई है।

और ठीक उसी इत्मीनान से वह यह भी देख रही थी और सुन रही थी इस सपने का किरदार किस तरह अपने को सही साबित करता हुआ एक एक टुकड़े को इकट्ठा कर रहा है और उस सपने की मरम्मत करने को आतुर भी था

एक बहुत बड़ा अंतर था पहले टूटे सपने की मरम्मत रानी करती थी उम्मीदों के साथ लेकिन इस बार कोई और कर रहा था बस अपनी झेंप मिटाने की जुगत के साथ

परंतु आज टूटे सपने की मरम्मत का जिम्मा तो किसी और ने उठा रखा था यह तो बात खास थी

वह बड़े ध्यान से देख रही थी यह सब

बहुत ही सावधानी से एक एक टुकड़े को उठाकर वह जोड़ने की कोशिश कर रहा था

सारे टूटे निशानों को भरने की कोशिश कर रहा था

रात भर जो रानी के आंखों से आंसू गिरे थे ना वह भी पिक्चर में दिखाते हैं कैसे रिवाइंड करते समय दृश्य उल्टी चलनी शुरू हो जाती है उसी तरह लग रहा था कि बहते हुए आंसू वापस रानी की आंखों से होकर अंदर तक फिर से पहुंचने लगे हैं और ऐसा लग रहा है कि वो आंसू कभी गिरे ही ना थे धीरे-धीरे एक-एक कतरा वापस सिमट गए आंखों की अथाह गहराइयों में

वह सपने का एक एक टुकड़ा इकट्ठा कर रहा था जोड़ रहा था अफसोस कर रहा था खुद को अपराधी भी मान रहा था और रानी बड़े इत्मीनान से इन सब हरकतों को देख रही थी सुन रही थी जो सिर्फ और सिर्फ वह देख सकती थी ,सुन सकती थी और कोई नहीं ।

बस सन्नाटे का चादर जो ओढ़ा हुआ था उसने वह चादर भी धीरे धीरे रिवाइंड होता हुआ उसके ऊपर से हटता जा रहा था अंत में उसने यही पूछा

"तुमने मुझे माफ कर दिया ना.. कर दो "

कई बार रानी ने कहा "हां माफ कर दिया ...कोई बात नहीं ...हो जाता है ऐसा "

ज़िन्दगी जो बीत गई वह आएगी क्या ? अब यह कैसे कहती उसको और जो आएगी कि नहीं उसकी आस अब और कितनी बार करेगी।

टूटे सपनों को जो उसने जोड़ा था उसमें बारीक बारीक से दरार बच रहे थे

उसकी बातें नन्हे नन्हे बीज बन उन जोड़े सपने की दरारों में जा फंसे थे

वहां कौन सी जमीन थी ?

कौन सी उर्वरा शक्ति थी वहां ?

छोटे-छोटे पौधे पनपने लगे थे

मान चुकी थी वह जान चुकी थी वह इत्मीनान में थी और उन पौधों को देख रही थी जो उन दरारों को हरा-भरा रखेंगे

जब फिर उसने एक बार कहा

“तुमने माफ कर दिया ना?”

"हां" रानी ने इतना हीं कहा था

उसी तरह यह माफी देना भी सच था जितना माफ़ी मांगना ।

रानी ने जान लिया था किसी के लिए वह जो भी करती है वह उसकी खुशी है ।लेकिन कोई और रानी के लिए क्या करेगा इस पर रानी का कोई वश नहीं ।किसी दूसरे से रानी को अपने लिए कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए।उसे अपनी खुशियों का आप हीं जिम्मेदारी लेना चाहिए, तब उसे किसी छननन की आवाज से पाला नहीं पड़ेगा।


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