आस्था अनास्था की दुविधा

Athism यह कोई नया शब्द नहीं है परंतु आजकल युवा होती पीढी के बीच इस शब्द का चलन बढ़ता जा रहा है आखिर शब्द का अर्थ क्या है आज की युवा पीढ़ी के बीच में इस शब्द का चलन क्यों बढ़ रहा है इस शब्द के चलन का बढ़ना अच्छा है या बुरा इन्हीं सब बातों पर चर्चा करना अब बहुत ही आवश्यक हो गया है

आजकल यह आम बात हो गई है कि एक युवा या युवती अपने अभिभावकों को यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि वह ईश्वर को नहीं मानते हैं युवा पीढ़ी सवाल करती है कि कहा जाता है कि ईश्वर बहुत अच्छे हैं सबका भला करते हैं सब के दुखों को दूर करते हैं तो इस दुनिया में फिर भी दुख क्यों है लगभग हर इंसान ही दुखी क्यों नजर आता है जिस मंदिर में जाकर हम ईश्वर से अपने लिए सुख मांगते हैं उसी मंदिर की सीढ़ियों पर अनेकानेक बेहद दयनीय व लाचार भिखारी क्यों दिखते हैं और जब यही युवा पीढ़ी जैसे ही सामर्थवान होती है वह खुद को एथिस्ट कहना शुरू कर देती है

शब्द को गौर से समझने की कोशिश करें तो इसका अर्थ कतई नहीं है कि धर्म पर विश्वास नहीं या किसी भी धर्म को नहीं मानना है अपितु यह उन चीजों को नहीं मानता जो तर्कसंगत नहीं लगता नास्तिक किसी भी धर्म के अंतर्गत हो सकते हैं किसी भी जाति के हो सकते हैं किसी भी देश के हो सकते हैं किसी भी रंग रूप के हो सकते हैं


ऐसा माना जाता है की पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व ग्रीक में इस तरह के शब्द का अस्तित्व देखा गया यह शब्द समाज के एक बड़े तबके द्वारा ईश्वर की पूजा से इनकार कर देने वालों के लिए कहा जाता था ऐसे लोग ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते थे और वह किसी तरह के आस्था भी नहीं दिखाते थे ऐसे लोग नहीं चाहते थे कि उन्हें किसी भी धर्म के अंतर्गत बँटा जाए इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 16वीं शताब्दी में बहुत तेजी से अस्तित्व में आया जब विचारों की स्वतंत्रता बढ़ने लगी और लोगों के मन में तथा विचारों में संशय और अविश्वास ने नास्तिकता बढ़ानी शुरू कर दी माहौल कुछ ऐसा बन गया कि लोग धर्म की बुराइयां बहुत ज्यादा करना शुरू कर दिए 18वीं शताब्दी के आसपास जब ज्ञान का दौर चल रहा था उस समय पहले व्यक्तिगत तौर पर किसी ने खुद को athist अर्थात नास्तिक कहने में गर्व महसूस किया था फ्रांस की क्रांति के समय राजनीतिक उथल पुथल के बीच नास्तिकों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी

नास्तिकता की व्याख्या करने के लिए उसके दर्शन को समझना पड़ेगा समाज के उन पहलुओं को समझना पड़ेगा जिस कारण नास्तिकता का उदय हुआ और इतिहास में पीछे जाकर उन पहलुओं को समझना पड़ेगा जिस कारण से नास्तिकता समाज में पनपने लगी ईश्वर का मानवीय स्वरूप और उनके द्वारा रचित कार्यों का साक्ष्य या सबूत के अभाव ने नास्तिकता को जन्म दिया ईश्वर अगर अच्छाइयाँ करता है तो दुनिया में बुराइयां क्यों दृष्टिगोचर होती है नास्तिकों के यह प्रश्न रहे खुद को ईश्वर का दूत कहने वालों ने ईश्वर के बारे में जो कुछ भी बताने की कोशिश की उसमें साक्ष्य का बहुत अभाव रहा बिना साक्ष्य के जब यह कहा जाता कि यह परम सत्य है और इसे झुठलाया नहीं जा सकता और ऐसी कई बातों को लेकर अविश्वास की भावना उत्पन्न हुई और नास्तिकता का जन्म हुआ जब जब किसी ने धर्म के नाम पर व ईश्वर के नाम पर होने वाले समाज में किसी अन्याय के ऊपर आवाज़ उठाने की कोशिश की तो उस आवाज़ को दबाने के लिए धर्म का सहारा बहुत ही भयानक रूप में लिया गया ऐसी घटनाओं ने भी नास्तिकता की भावना को मजबूत किया नास्तिकों का मानना है कि मनुष्य का जब जन्म होता है तब वह ना तो किसी धर्म से संबंधित होता है और ना ही वह किसी ईश्वर का नाम अपने मुख पर लेकर जन्मा होता है हमारा समाज है जो उसे किसी धर्म से जोड़ता है या किसी देवता का नाम उसे सिखाता है नास्तिकों को अपना दर्शन प्रस्तुत करने में इतनी परेशानी नहीं है जितनी परेशानी आस्तिकों को साबित करने में है कि वह जो कुछ भी बोल रहे हैं उसका प्रमाण है समय के साथ एक अलग तरह की आस्था का उदय हुआ जहां सभी धर्मों में बताई गई कुछ सामान्य दर्शन को लोगों ने मानना शुरू कर दिया खुद को एक धर्म से न जोड़कर उन्होंने आस्था तो रखी परंतु सभी धर्मों के लिए उनकी एक ही आस्था थी

हिंदू धर्म के वैदिक काल से ही सांख्य एवं मीमांसा मान्यता ने ईश्वर के लौकिक रूप को नहीं माना है बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म ने भी हिंदू धर्म की कई बातों को मानने से इनकार किया है इतिहास से लेकर आज तक के दौर में आस्तिक ही नास्तिकों से श्रेष्ठ माने जाते रहे हैं नास्तिकों को किसी भी प्रकार का सम्मान समाज नहीं देता है चाहे आप अपने धर्म की मान्यताओं को माने या ना माने लेकिन फिर भी आपको अपने धर्म के साथ जुड़कर ही रहना है नहीं तो आप समाज में बिल्कुल ही अलग-थलग पड सकते हैं आधुनिक दौर में बहुत से दार्शनिकों ने लोगों के बीच अपने विचार रखे हैं कि नास्तिक मान्यता के लोगों को तिरस्कृत नहीं करना चाहिए परंतु यह तो अभी संभव होता नहीं दिख रहा

आज की युवा पीढ़ी को संभालना सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है युवा पीढ़ी अपने तर्क की कसौटी पर अक्सर ही बहुत से धार्मिक मान्यताओं को नहीं मानती है उनकी अवहेलना करती है कभी-कभी तो युवाओं को चरम सीमा तक जाते देखा है जब वह अच्छे और बुरे के बीच का भेद भूल रहे हैं और खुद को नास्तिक कहने में वे रीति रिवाज या धर्म की बातों को नकारने में कई उन सब बातों को भी नकार रहे हैं जो बातें परम सत्य हैं कहीं ऐसा ना हो कि यह चरमपंथी उन लोगों को गलत दिशा में ले कर चली जाए

अपनी मान्यताओं में थोड़ा सा बदलाव समझदारी और लचीलापन अपना कर अभिभावकों को अपने बच्चों को सही ज्ञान देना होगा जैसे कि वह बच्चों से कह सकते हैं कि ईश्वर को तुम अगर किसी आकार के रूप में नहीं मानना चाहते तो मत मानो उर्जा तो है ज़रूर जो हमारे ही अंदर है आत्मा का नाम दे सकते हो अगर हमारे आचार व्यवहार विचार सकारात्मक रहे तो सकारात्मकता का प्रभाव सदैव सकारात्मक हीं होता है और वह ईश्वर है

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