तेते पाँव पसारिये, जेती लाँबी सौर

आदरणीय कवि वृंद जी के दोहे के माध्यम से अपने विचार प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही हूं👇 मेरी प्रस्तुति कैसी रही अपनी प्रतिक्रिया देकर जरूर बताएं✍️ rashmikiran@outlook.com "राघव सुन तो जरा अब हमें अपनी गाड़ी बदल देनी चाहिए" रीना के बोलते हीं अचानक से राहुल के मुंह में चाय की सुरकी जोर से लगी और कप उसने पटक कर नीचे रखा साथ हीं चाय मुंह से नीचे फेंक दिया। राहुल की जीभ जल गई थी । हड़बड़ाहट में उसने गरम गरम चाय का एक बड़ा सा घूंट मुंह में ले लिया था। "लेकिन हमारी गाड़ी तो ज्यादा पुरानी हुई नहीं है? और अभी चल भी बड़ी अच्छी रही है ..फिर नई गाड़ी लेने की जरूरत क्या है?" राहुल खीजता हुआ बोला "देखो ना हमारे जो पड़ोसी हैं उन्होंने अभी अभी बड़ी सी नई गाड़ी एकदम चमचमाती हुई सी ली है जब भी हमारी गाड़ी को देखती हूं तो हमें लगता है कि हम कितनी कबाड़ा सी गाड़ी पर चल रहे हैं मुझे बड़ी शर्म आती है" रीना ने राहुल की तरफ देख भी नहीं रही थी वह तो यह सारी बातें अपने पड़ोसी के घर में झांकती हुई बोल रही थी "उन्होंने यह गाड़ी नहीं ली है।असल में उनके बेटे की नौकरी लगी और बेटे ने उन्हें यह गिफ्ट की है। लेकिन हम अभी नई गाड़ी में पैसे खर्च कैसे करें जबकि अभी गाड़ी हमारी अच्छी चल रही है और घर में तो दूसरे काम है पैसों के । हम गाड़ी में पैसे लगा देंगे तो घर के और कामों को हम कैसे करेंगे हमारे तो बच्चे की पढ़ाई भी अभी सर पर है।" राघव ने रीना को समझाने की कोशिश की "तुम तो हमेशा से ही कंजूस रहे हो । क्या करोगे पैसे बचा बचा कर ?ग़रीबों की तरह ही रहते हो बस । दूसरे लोगों को देखो कितनी शान से रहते हैं।" ऐसी उलाहना देना रीना को बड़े अच्छे से आता था अब जब तक घर में नई गाड़ी नहीं आ जाएगी तब तक घर का माहौल ऐसा ही तनाव भरा बना रहेगा। हर बात पर रीना राहुल को ताने देती रहेगी और राहुल झूंझलाता रहेगा। यह तो एक बहुत छोटी सी कहानी है यूं कहे की एक कहानी का छोटा सा हिस्सा है ।लेकिन यह कहानी का छोटा हिस्सा लगभग हर मन में मौजूद है। क्या अब भी आप की परेशानी का कारण आप को नहीं मिल रहा ? इसके कारण की इतनी लंबी लिस्ट है कि उसको गिनाते गिनाते पता नहीं कितना समय लग जाए चाहे तो यह कि १.उसके बच्चे को ज्यादा नंबर कैसे आता है मेरे बच्चे को क्यों नहीं? २.वह ज्यादा बड़े स्कूल में पढता है मेरा बच्चा क्यों नहीं ? ३. उसकी साड़ी इतनी कीमती क्यों मेरे पास क्यों नहीं ? ४.वह विदेशों में छुट्टियाँ मनाने जाता है हम क्यों नहीं? वगैरह वगैरह वगैरह इन दिमागी फितूर का अंत होता हीं नहीं हैं एक का अंत होते हीं दूसरी इच्छा मुंह बाए खड़ी हो जाती है । सूरसा के मुंह जितनी बड़ी होती जाती है यह लोभ तृष्णा ईर्ष्या । इस सूरसा के मुख्य से हनुमान जी की तरह अगर चालाकी से बाहर निकल आना है तो अपनी पहुंच पर विचार करना पड़ेगा।पहुंच पर विचार करने का अर्थ है कि अपनी हालात और अपनी हैसियत को समझना पड़ेगा। हम उतना ही कार्य कर सकते हैं जितनी हमारे अंदर उस कार्य को करने की क्षमता है और हम किसी भी वस्तु के लिए उतना ही खर्च कर सकते हैं जितनी कि हमारे पास आय हैं। अपनी पहुंच विचार कर ही हमें अपना करतब अर्थात कार्य करने के बारे में सोचना चाहिए।दूसरों से तुलना करते रहेंगे तो दुखी रहेंगे क्या आप बिना कारण दुखी हैं ? आप बिना कारण दुखी नहीं है। मन में संतोष ही नहीं है। सदैव कहीं ना कहीं एक कोने में हलचल मची रहती है कि यह भी चाहिए वह भी चाहिए और वह भी चाहिए। आप ईर्ष्या से जल रहे हैं? ईर्ष्या से जलते रहने से अच्छा है कि विचार करें कि अपना पांव कितना पसारना है और उसी सीमा में खुश रहने की कोशिश करें और अपने मन को उस ओर से आश्वस्त करे। कहीं आप को अवसाद तो नहीं घेर रहा ? अवसाद तो घेरे गा साथ हीं साथ इस हद तक चला जाएगा कि अंत में वह आत्महत्या के मुहाने पर लाकर खड़ा कर देगा । कभी-कभी लोग इतना कर्ज ले लेते हैं कि उस कर्ज के बोझ से वह जिंदगी भर नहीं उबर पाते हैं। दूसरों से तुलना करते करते अपने आप को इतना निकम्मा समझ लेते हैं जिंदगी का अंत करने पर ही तुल जाते हैं । वैसे तो यह समस्या है बहुत बड़ी लेकिन इतनी भी बड़ी नहीं है कि उसे सुलझाया ना जा सके। आवश्यकता है थोड़ी समझदारी की और निम्नलिखित दोहे का मनन करने की ।इसे आचरण में लाने की कोशिश करें ।हो सकता है लाभ हो । "अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिये दौर। तेते पाँव पसारिये, जेती लाँबी सौर।।" हिन्दी साहित्य के रीतकालीन कवि वृन्द जी का यह दोहा है वृंद का जी का जन्म 1643 ईस्वी में राजस्थान के जोधपुर जिले के मेड़ता नामक गांव में हुआ था। इनका पूरा नाम वृन्दावनदास था।दस साल की उम्र से ही काशी में रहकर उन्होंने शिक्षा दीक्षा प्राप्त की थी। औरंगज़ेब के दरबारी कवि भी रहे थे। उन्होंने बहुत से नीतिपरक दोहे लिखे है।

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