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पौराणिक काल में अध्ययन की शाखाएं

Updated: May 29

पौराणिक काल में अध्ययन की शाखाएं होती थीं जो इस प्रकार है

चार वेद


ऋग्वेद इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आह्वान के मंत्र हैं इस वेद में औषधियों की भी जानकारियां है जल चिकित्सा वायु चिकित्सा सौर चिकित्सा मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा की जानकारियां इसमें हैं


यजुर्वेद इसमें श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा लिखी गई है यज्ञ की विधियां और मंत्रों को लिखा गया है साथ ही रहस्यमय ज्ञान जैसे ब्राम्हांड आत्मा ईश्वर और पदार्थ के बारे में भी बताया गया है इस की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण

सामवेद इस वेद को संगीत और नृत्य शास्त्र का मूल माना जाता है इसमें सविता अग्निऔर इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र है


अथर्ववेद इसमें रहस्यमय विद्याओं जड़ी बूटियों चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जब जिक्र है इसमें भारतीय परंपरा और ज्योतिष का ज्ञान भी मिलता है


उप वेद उपांग


स्थापत्य वेद वास्तु शास्त्र वास्तुकला की जानकारी


धनुर्वेद युद्ध कला का विवरण


गंधर्व वेद गायन कला की जानकारी


आयुर्वेद स्वास्थ्य विज्ञान की जानकारी


वेदांग


शिक्षा इसमें ध्वनियों का उच्चारण बताया गया है


निरुक्त इसमें शब्द मूल शब्दावली और शब्द निरुक्त के विषय में बताया गया है


व्याकरण संधि समास उपमा विभक्ति वाक्य निर्माण की जानकारी है


छंद गायन व मंत्र उपचार के लिए आघात और लय की जानकारी है


कल्प इसमें यज्ञ के लिए विधिसूत्र बताई गई है


ज्योतिष समय की जानकारी आकाशीय पिंडों की गति और स्थिति की जानकारी दी गई है


पुराण

पुराणों में दुनिया और जीवन से संबंधित अनेका अनेक वृतांत है ऐसा माना जाता है कि इसको वैदिक काल के बहुत समय बाद लिखा गया

18 पुराणों में पाप पुण्य धर्म धर्म कर्म अकर्म देवी देवता राजाओं ऋषि सामान्य जनों की अनेकानेक गाथाएं हैं पुराण में विषयों की कोई सीमा निर्धारित नहीं है

ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने जिस प्राचीनतम ग्रंथ की सर्वप्रथम रचना की वह पुराण हीं है वेदव्यास जी ने पुराण को सृष्टि के सभी जनों के लिए ब्रह्मा जी के आशीर्वाद से रचना की और पुनर्रचना की...आम जनों के लिए वेदों को समझ पाना आसान नहीं होने के कारण वेदों की जटिलता को लोगों की समझ आने लायक सरल भाषा में पुराण में लिखा गया


18 पुराणों के नाम


१) ब्रह्म पुराण:- नैमिषारण्य में लोमहर्षण ऋषि ने इसका प्रवचन दिया था इस पुराण में उड़ीसा के कोणार्क मंदिर का वर्णन मिलता है


२)पद्म पुराण:- लोमहर्षण ऋषि के पुत्र उग्रश्रवा नैमिषारण्य में इसका प्रवचन किया था


३)विष्णु पुराण:- स्क्रीन का प्रवचन पराशर ऋषि ने किया था और इसके श्रद्धा थी मैत्रेय


४) वायु पुराण:- इसे शिवपुराण भी कहा जाता है क्योंकि इसमें शिव का वर्णन मिलता है वैसे एक अलग शिवपुराण भी है गया की महत्ता इस पुराण में मिलती है इसीलिए इस पुराण का प्रचलन मगध क्षेत्र में बहुत था


५)भागवत पुराण:- इसका रचनाकाल ६वि शताब्दी माना गया है यह सर्वाधिक प्रचलित पुराणों में से एक है क्योंकि इसमें श्री कृष्ण की भक्ति के बारे में बताया गया है इस पुराण को देवीभागवतपुराण भी कहते हैं क्योंकि इसमें देवी की शक्ति का विस्तृत वर्णन है


६)नारद पुराण :- इसी महापुराण भी कहा जाता है


७)मार्कंडेय पुराण:- मार्कंडेय ऋषि ने इस पुराण का भाषण किया था और श्रोता थे क्रौष्टुकि ऋषि इसी पुराण में दुर्गा महात्म्य है और अनुसूया की पतिव्रता कथा भी है इस पुराण में गृहस्थ धर्म श्राद्ध दिनचर्या नित्यकर्म व्रत उपवास आदि का वर्णन मिलता है


८)अग्नि पुराण:- यह पुराण भारतीय संस्कृति और विद्याओं का महाकोष माना जाता है इस के प्रवक्ता अग्नि ऋषि थे और श्रोता वशिष्ठ ऋषि थे


९)भविष्य पुराण:-इस पुराण में भविष्य की घटनाओं का वर्णन है


१०)ब्रह्मवैवर्त पुराण:-श्री कृष्ण का वर्णन है


११)लिंग पुराण:- इस पुराण में शिव की उपासना का वर्णन है किन्ही कारणों से इस पुराण को पुराणों के सभी लक्षणों से युक्त नहीं माना जाता है


१२)वाराह पुराण:- इस पुराण में वराह अवतार का वर्णन है


१३)स्कंद पुराण:- यह सबसे बड़ा पुराना है शिव के पुत्र कार्तिकेय को स्कंध के नाम से भी जाना जाता है इस पुराण में भी पुराण के बहुत से लक्षण नहीं मिलते हैं


१४) वामन पुराण;- विष्णु के वामन अवतार का वर्णन किस पुराण में है


१५) कूर्म पुराण:- विष्णु के कूर्मअवतार का वर्णन किस पुराण में


१६)मत्स्य पुराण:- इस पुराण में कलयुग के राजाओं की सूची दी गई है


१७)गरुड़ पुराण:- ऐसा माना गया है कि इस पुराण के प्रवक्ता विष्णु और श्रोता गरुड़ हैं गरुड़ ने यह पुराण कश्यप को सुनाया था इसमें विष्णु पूजा का वर्णन है


१८)ब्रह्मांड पुराण:- इसकी रचना का काल 400 ई से 600 ई के मध्य मानी जाती है


उपपुराणों की संख्या लगभग 24 मानी गई है


आदि पुराण :- सनत्कुमार द्वारा कथित

नरसिंह पुराण

नंदी पुराण :- कुमार द्वारा कथित

शिव धर्म पुराण

आश्चर्य पुराण :- दुर्वासा द्वारा कथित

नारदीय पुराण :- नारद द्वारा कथित

कपिल पुराण

मानव पुराण

उशना पुराण

ब्रह्मांड पुराण

वरुण पुराण

कालिका पुराण

माहेश्वर पुराण

सांब पुराण

सौर पुराण

पराशर पुराण :- पराशर द्वारा कथित

मारीच पुराण

भार्गव पुराण

विष्णु धर्म पुराण

बृहद्धर्म पुराण

गणेश पुराण

मुद्गल पुराण

एकाम्र पुराण

दत्त पुराण


भारतीय दर्शन में छ: प्रकार के दर्शनशास्त्र के अध्ययन का उल्लेख मिलता है

पूर्व मीमांसा( महर्षि जैमीनी) ) मीमांसा का अर्थ होता है जिज्ञासा अर्थात जानने की लालसा इस ग्रंथ में इस बात का दर्शन दिया गया है कि ऐसा कौन सा कर्म है जिसको करने से धर्म होता है और जो धर्म है वैसा कर्म करना ही उचित है उदाहरण के लिए एक लकड़हारा पेड़ काटता है और उसकी लकड़ी से एक बढ़ई बैलगाड़ी तैयार कर देता है यह बैलगाड़ी आम जनों के लिए बहुत उपयोगी होती है इस तरीके से वह लकड़हारा और वह बढई धर्म का कार्य करता है उन दोनों का कार्य यज्ञ कहलाएगा इसी तरह की दर्शन हो को महर्षि जैमिनी समझाया है


उत्तर मीमांसा (महर्षि बादरायण) इसे ब्रह्म सूत्र भी कहा जाता है इसमें ब्रह्म की जिज्ञासा का दर्शन बताया गया है जगत क्या है क्यों है कहां है कैसे हैं सुख दुख क्या है जैसे अनेक जिज्ञासाओं का इसमें उल्लेख है


सांख्य (महर्षि कपिल) यह दर्शन सबसे पुराना दर्शन माना जाता है इसमें सृष्टि की व्याख्या एवं प्रकृति और पुरुष की व्याख्या मिलती है प्रकृति से लेकर स्थुल भूत पर्यान्त सारे तत्वों की संख्या की गणना इसमें की गई है


वैशेषिक (महर्षि कणाद) यह दर्शन विज्ञान मुल्क है इसमें परिमंडल पंचमहाभूत और इन भूतों से बने सब पदार्थों का वर्णन किया गया है


न्याय (महर्षि गौतम) इस दर्शन में किए गए कर्मों का क्या फल मिलता है और इसके प्रमाण क्या है का वर्णन है इस दर्शन में जांच-पड़ताल के उपायों का वर्णन किया गया है सत्य की खोज के लिए 16 तत्व है और तत्व के द्वारा वास्तविकता का पता किया जा सकता है इस दर्शन को तर्क करने का व्याकरण भी कह सकते हैं


योग (महर्षि पतंजलि) इस दर्शन का नाम योग है इसने आसन और प्राणायाम के बारे में बताया गया है लेकिन बस इतने तक है इस दर्शन को सीमित कर हम व्याख्या नहीं कर सकते के योग के द्वारा मन और आत्मा में शुभ गुणों को स्थापित कर हम ईश्वर को जान सकते हैं और मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं





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