मन की सुंदरता उचित है

सुंदरता को लेकर बहुत कम इंसानों में ही कोमल भावनाएं होती हैं। अधिकतर इंसानों में ऐसा देखा गया है कि वह सुंदरता को बर्बाद कर देने की कोशिश करते हैं ।जैसे कि एक सुंदर फूल कहीं दिख रहा हो तो उसे पौधे पर ही नहीं रहने दे कर इंसान उसे तोड़ लेना चाहता है। कुछ देर अपने हाथों में रखता है, फिर कहीं बड़ी बेरहमी से फेंक देता है या मसल देता है या उसकी पंखुड़ियां तोड़ डालता है। सुंदरता की किस प्रकार इज़्ज़त की जाए तथा उसकी रक्षा किस प्रकार की जाए और उसका आनंद किस प्रकार लिया जाए उस आनंद से अपने जीवन को किस प्रकार सकारात्मकता और आनंद से भरा जाए यह बात बहुत कम हीं इंसानों को समझ में आती है ।

प्रकृति में जो भी सुन्दर है हम पूरे हक से उस सुंदरता का आनंद लेते हैं। हाँ मानवता व मानव धर्म है ,जो हमें सचेत करता है, समझाता है कि हम उन को कष्ट न पहुंचाये, उनका नुकसान न करें। यह हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि प्रकृति की हर सुंदरता को हम सहेज कर रखें।प्रकृति तो हम से इस विषय पर कोई बहस नहीं करती?

क्या इंसान प्रकृति से परे है? क्या इंसान की सुंदरता प्राकृतिक नहीं?हम इंसान की सुंदरता को प्राकृतिक क्यों नहीं मान सकते। जैसे कि एक खूबसूरत फूल प्रकृति में खिलता है उसी तरह कोई इंसान खूबसूरत दिखता है फिर क्यों किसी इंसानी सुंदरता को बहस, हवस, कामुकता, उत्तेजना आदि के दल दल में लपेटते हैं। किसी की खूबसूरती को देखकर मन खुश होता है । प्रशंसा के कुछ शब्द कहने का मन हो उठता है तो बस इतना कह देना क्या उचित नहीं कि "हां खूबसूरत हो और तुम्हें देख अच्छा लगा"।

परन्तु ऐसा संयम कम ही लोगों में देखने को मिलता है । अधिकतर लोग उस सुंदरता को अपने कब्ज़े में कर लेना चाहते हैं और उस सुंदरता का उपभोग करना चाहते हैं। चाहे उसके बाद मन भर जाए और उसे कहीं कचरे में फेंक दिया जाए।

एक मासूम सुंदरता को कुछ लोग अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करते है। मानव की सुंदरता भी प्रकृति की हीं रचना है प्रकृति की उस सुंदरता का भी प्राकृतिक कोमलता से आनंद लेना चाहिए मलीन नहीं करना चाहिए।

मानवीय सुंदरता को लेकर एक दूसरा अनुभव भी होता है।एक बार मैंने किसी की सुंदरता को देखकर उनकी प्रशंसा कर दी बस इतना ही कहा कि आप खूबसूरत हो लेकिन उसके बाद मुझे जो अनुभव हुआ वह निम्नलिखत दो पंक्तियों में है


नेमत-ए-हुस्न पर कसीदे जो पढ़ दिये।

आवारा आशिक-ए-तोहमत नवाजे गये।

~~रश्मि किरण


इससे यही समझ में आया के मानवों ने कुछ इस तरह का माहौल समय के साथ तैयार कर लिया है कि अगर सकारात्मक तरीके से और मुक्त हृदय से भी आप बिना किसी नकारात्मकता के किसी की प्रशंसा कर दें तो लोग यह सोचने लगते हैं कि आप तो किसी दूसरे ही झमेले में पड़ गए हैं


हँस के जो पूछ लेती हूँ तेरा हाल।

निकम्मा हीं समझ लेते हो बेज़ार।

~~रश्मि किरण

कुछ सुंदरता तो ऐसी होती है जो पूरे तरीके से यह समझ कर कि उसकी खूबसूरती पर लोग मोहित हो रहे हैं उस सुंदरता को अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते है।

मानव मन की एक और परेशानी यह है कि वह सुंदरता को लेकर तृष्णा में पड़ जाते हैं ।इच्छाएं अनंत होती हैं ।एक इंसान दूसरे से अपनी तुलना करने लगता है। उदाहरण के लिए गोरे होने को सुंदरता का एक बहुत बड़ा पैमाना मानकर लोग कई तरह के उपायों को अपनाने लगते हैं और बहुत तरह की मुसीबतों में भी पड़ जाते हैं ।

सुंदरता के विषय पर इतने सारे विचार करने के कारण है कि हम एक धारणा पर बातचीत नहीं कर सकते और यही कारण है कि यह बहस का मुद्दा बनता है ।

अंत में मानवों के मन को शांत करने के लिए विद्वान यह कह गए हैं कि तन की सुंदरता पर ध्यान ना दे कर मन की सुंदरता पर ध्यान देना हीं हर तरह से उचित है।


😊प्रतिक्रिया का इंतजार रहता है 👆rashmikiran@outlook.com ✍️


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