• rashmi kiran

माला फेरत जुग भया

Updated: May 27


जप माला लगभग सभी धर्मों में ईश्वर का नाम जाप करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. जप माला का उपयोग शायद इसीलिए शुरू हुआ होगा कि कितनी बार मंत्र का जाप किया गया है इस पर ही ध्यान केंद्रित ना हो जाए बल्कि ध्यान मंत्र के शब्दों के ऊपर केंद्रित रह सके और मंत्र जाप का लाभ प्राप्त हो सके जाप करने की परंपरा के पीछे धार्मिक उद्देश्य ही नहीं वरन वैज्ञानिक उद्देश्य भी है जब हम किसी एक शब्द पर या किसी एक भाव पर या बात पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं और उसे बार-बार बोलते हैं तो हमारी आत्मशक्ति जागृत होती है इससे हमें अपने जीवन के मकसद पर भी आत्मविश्वास जागृत करने में मदद मिलती है जपमाला छोटे - बड़े गोल आकार के विभिन्न धातुओं ,मिट्टी लकड़ी या बीज के दानों को जोड़कर बनाया जाता है . जहां तक जानकारी प्राप्त होती है कि इंसानी सभ्यता के प्रारंभिक कालों से ही आभूषणों को बनाने के लिए या अन्य सजावट के लिए छोटे- बड़े गोलाकार दानों को बनाया जाता रहा है. इतिहास में बताया जाता है कि लगभग 10,000 ईसा पूर्व अफ्रीका में ऑस्ट्रिच पक्षी के अंडों के खोेलों से दाने बनाए जाते थे जप माला का प्रारंभिक इतिहास हिंदू धर्म में ही प्राप्त होता है .संभवतः हिंदू धर्म से ही अन्य धर्मों ने जप माला को अपनाया. उर्दू में इसे तस्बीह कहा जाता है इसमें ‌99 या 33 मनके होते हैं यह माला लकड़ी जैतून के बीज हाथी दाँत ऐम्बर मोती या प्लास्टिक के मनकों से बनाते हैं सूफी संतों के पास 100 या 200 मानकों की माला भी हो सकती है । इतिहास में सत्रहवीं शताब्दी के लगभग इसके प्रयोग की परंपरा का उल्लेख मिलता है।ई.पू. नवीं शताब्दी में पत्थरों से गणना करने का भी उल्लेख मिलता है ऐसा माना जाता है कि बौद्ध धर्म में जपमाला का प्रयोग लकड़ी के १०८ मनकों की माला बना कर नमः बुद्ध नमः धर्म नमः संघ का जाप के उद्देश्य से हुआ ..और तब से जपमाला की परंपरा शुरू हुई ।२७ मनकों की माला भी प्रयोग होती है जिसकी चार बार गिनती की जाती है। सिख धर्म में माला जाप का ज्यादा प्रावधान नहीं है गुरु वाणी में माला जाप को दिखावे की प्रक्रिया बताया गया है कई बार कई जगह पर यह उल्लेख हुआ है कि माला तिलक अलग तरीके के कपड़े पहन कर यह धर्म का दिखावा करने वाले अपने को ईश्वर के करीब दिखाते हैं परंतु यह लोग अपने हृदय से धार्मिक नहीं होते और गलत कामो में लिप्त रहते हैं फिर भी माला का उपयोग सिख धर्म में होता है 108 मनकों की माला होती है वैसे तो सभी मनकों का आकार बराबर होता है परंतु एक मनका कुछ बड़ा सा या कुछ अलग सा होता है जो यह बताने के लिए होता है कि हमारी गिनती यहां पर पूर्ण हुई और दूसरे फेरे की गिनती शुरु हो गई है हिंदू धर्म और कई अन्य धर्मों जैसे बौद्ध धर्म जैन धर्म और सिख धर्म में 108 की संख्या को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है उदाहरण के लिए कहा जाता है कि मंत्रों का जाप 108 बार करना चाहिए हिंदू धर्म में किसी एक भी देवी या किसी भी एक देवता के 108 नामों का उल्लेख मिलता है उन सभी नामों के होने की अलग अलग व्याख्या भी है कान्हा की 108 गोपियों के होने का भी उल्लेख कहीं-कहीं मिलता है 108 में एक परम ब्रह्म या परम शक्ति या कह सकते हैं एक में ही सब निहित है इस बात का द्योतक है। 0 इस बात का द्योतक है के सब अंत में शून्य में समा जाता है ।कुछ भी यहां सदा रहता नहीं सब खाली हो जाता है और 8 अंग्रेजी के इनफिनिटी के चिन्ह के मतलब को लिए हुए हैं। मतलब कि ब्रह्म का विस्तार या सत्य का विस्तार या शक्ति का विस्तार अनंत है उसका अंत नहीं है। 108 के साथ ही एक और मनका जाप माला में होता है जो मध्य बिंदु होता है जहां से जाप की शुरुआत की जाती है और वहीं पर जाप का अंत भी होता है इस मनके को सुमेरु बिंदु स्तूप या गुरु मनका कहा जाता है गिनती हमेशा सुमेरु के बगल में एक मनका के साथ शुरू होती है । हिंदू, वैदिक परंपरा में, यदि एक से अधिक दोहराव की माला की जानेवाली हो, तो व्यक्ति इसे पार करने के बजाय सुमेरू तक पहुंचने पर दिशा बदलता हैं । जप से पूर्व निम्नलिखित मंत्र से माला की वन्दना करनी चाहिए– (साधना या देवता विशेष के लिए अलग-अलग माला-वन्दना होती है) ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणी। चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥ ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे। जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥ ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्वमन्त्रार्थसाधिनि साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा | 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्ये' गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् | सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि | लेकिन अंत में सत्य को जानना हीं वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए इसलिए इस बात को एक बार याद करना हीं चाहिए "माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर, कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।" कबीर का कहना मानें तो सही यह है कि माला के मनके में या मंत्र तंत्र में कोई लाभ नहीं लाभ तो तब होता है जब हम अपने मन की भावनाओं के मोतियों को सकारात्मकता से फेरते हैं {This website is for the love of Hindi India and positivity It can be a language tutor . A beautiful person with beautiful heart and soul can receive the positivity of this site . Articles of this site will help you as a life coach School . Your support and love for this site can make it a best selling Author Store}

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