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राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त भाग-१

Updated: May 29

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी राष्ट्रीय जागरण के प्रमुख कवियों में से एक हैं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में साहित्य के माध्यम से उनके योगदान भुलाया नहीं जा सकता है बस अपना ही राष्ट्रीय नहीं अपितु वसुधैव कुटुंबकम की भावना को भी उन्होंने प्रेरित किया जब-जब राष्ट्र को जैसी भावना चाहिए थी उनकी कविताएं वैसी रहती रही कभी करुणा लिए तो कभी निज गौरव लिए

भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं वह हृदय नहीं है पत्थर जिसमें स्वदेश से प्यार नहीं अपनी कविता नर हो ना निराश करो मन में कवि ने जनसाधारण की राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया है भी भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के परम भक्त थे अंधविश्वासों और थोथे आदर्श पर यकीन नहीं करते थे वह जागृत राष्ट्र की कल्पना करते थे वह आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आए और उनसे प्रेरणा प्राप्त करके अपनी ब्रज भाषा को विराम दे खड़ी बोली हिंदी को अपनी राष्ट्रीय जागरण की कविताओं का माध्यम बनाया उनकी कविताएं मासिक सरस्वती में प्रकाशित होना शुरू हो गई

सरस्वती में एक चित्र के नीचे छापने के लिए अक्सर ही द्विवेदी जी गुप्तजी से कहते थे कि कुछ पंक्तियां लिख दे वे तुरंत लिख दिया करते थे उन्हें प्रयासों में जयद्रथ वध भारत भारती आदि कविताओं का लिखा जाना संभव हुआ राष्ट्रीय जागरण की दिशा में उनका सबसे पहला बड़ी काव्य रचना थी रंग में भंग का प्रकाशित होना भारतेंदु युग से ही राष्ट्रीय चेतना जागृत हो चुकी थी और उसी मशाल को लेकर साहित्य में आगे बढ़े थे गुप्तजी सर सैयद से प्रेरणा लेकर मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपनी कविता का स्वर देश के लिए मंगलकारी उद्देश्य पूर्ण करने वाली रचनाएं लिखनी शुरू कर दी परंतु युग बदला समय बदला परिस्थितियां बदली इसलिए दोनों ही काल की राष्ट्रीय चेतना में अंतर तो होना ही था अंग्रेजों की भारत विरोधी नीतियां स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी थी देश में उस से मुकाबला करने के लिए कई संगठनों ने सर उठाना शुरू कर दिया था राजाओं के प्रभाव से जनता अलग होने लगी थीऔर एक देश भारत देश की सोच स्थापित होने लगी थी इन्हीं का असर था कि मैथिलीशरण गुप्त जी की कविताएं में नमक जागृत राष्ट्रीय चेतना का स्वर ज्यादा उग्र और आक्रमक था

जो मात्र सेवक हो वही सुत श्रेष्ठ जाता है गिना

कोई बड़ा बनता नहीं लघु और नम्र हुए बिना

मैथिलीशरण गुप्त जी ने यह बात समझ लिया था कि उस समय के सामाजिक व्यवस्था के ढांचे में सुधार करने की आवश्यकता है पुराने आदर्शों और नई व्यवस्था के आदर्शों में तालमेल बैठाने की जरूरत थी जाति मूलक सुधारों से ही देश को विकास दिया जा सकता था गुप्त जी को देश और समाज सुधार के आवश्यक तत्व का ज्ञान हो गया था

गुप्त जी का साहित्य लिखने का समय नवजागरण का समय था अतीत से सही और गलत की प्रेरणा कैसे लें यह गुप्तजी ने स्थापित किया उन्होंने वर्तमान के लिए अतीत से प्रेरणा ली उन्होंने परंपराओं वर्णो वर्गों धर्मों के लोगों में एकता स्थापित करने की कोशिश की एक मिलती-जुलती संस्कृति को बढ़ावा दिया जहां सब अपने सुख-दुख साझा कर के रहे उस समय की राष्ट्रीय आंदोलन की यही आवश्यकता थी कि सभी समभाव में रहे और एक राष्ट्र के तौर पर मजबूत बने जहां एक और गुप्त जी ने किसी धर्म विशेष या जाति विशेष की आलोचना की है वहीं राष्ट्रीय आंदोलन की जरूरत के लिए राष्ट्रीय जागरण के लिए सभी धर्मों की विशेषताओं का गुणगान भी किया है वैसे तो यह भारत की ऐतिहासिक सच्चाई है कि यहां सदन से बाहर ही धर्म और जाति के लोगों ने आकर यहां की सभ्यता और संस्कृति को मिटा देने की कोशिश की है

अंत अंत तक अंग्रेजों ने भी धर्मों के आधार पर फूट डालो राज्य करो कि अपनी नीति से देश को बहुत नुकसान पहुंचाया है गुप्ता जी ने गहराई से इन भावनाओं को लिखा भारत भारती बहुत लोकप्रिय कविता हुई आंदोलन का स्वर बनी इस कविता में आगे के आने वाले समय की सुंदर तस्वीरों की उम्मीद कवि ने जगाया है इसके शब्दों में ऐसा कमाल है कि नवयुवक जोश और आत्मसम्मान से ओतप्रोत हो जाते हैं

हे भाईयों सोए बहुत अब तो उठो जागो अहो

देखो जहां अपनी दशा आलस्य को त्यागो अहो

कुछ पार है क्या क्या समय के उलटफेर ना हो चुके

अब भी सजग होगे न क्या सर्वस्व हो तो खो चुके

देश की उस समय की स्थिति का बिना खौफ उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपनी कविता भारत भारती में वर्णन किया चाहे वह गरीब हो व्यापार हो अमन हो शिक्षा हो समाज का हर चित्र उन्होंने कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया महिलाओं के प्रति उनकी भावना का जिक्र हमें साकेत में उर्मिला के चरित्र से पता चलता है जिसमें उर्मिला को स्वाभिमानी जागृता शक्ति रूपा वीरांगना के रूप में चित्रित किया गया है उन्होंने किसानों का वर्णन भी अपनी कविता में किया है किसान जोहर विपरीत परिस्थितियों में भी कभी हार नहीं मानता और पूरी कर्मठता से मेहनत में लीन रहता है

"देखो कृषक शोषित सुखाकर हल तथापि चला रहे" महात्मा गांधी जी से बेहद प्रभावित रहे उन्होंने गांधीजी के कई विचारों और कार्यों का अनुसरण किया और अपनाया जैसे सत्य अहिंसा चरखा नैतिक राजनीतिक विचार सविनय अवज्ञा आंदोलन आदि इस तरह गुप्तजी राष्ट्रीय जागरण के सशक्त व महत्वपूर्ण कवि हैं

भाषा शैली और काव्य शिल्प

मैथिलीशरण गुप्त जी पहले ब्रज भाषा में रचना किया करते थे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के संपर्क में आने के बाद से उन्होंने खड़ी बोली में काव्य रचना आरंभ की भाषा शैली में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने उनकी रचनाएं मुख्य रूप से प्रबंधात्मक काव्य और वृत्त में शैली में रही साकेत एक महाकाव्य है इसके अलावा अन्य काव्य खंड काव्य के अंतर्गत उन्होंने लिखा

भारत भारती और हिंदू कविता की रचना उन्होंने विवरण शैली ने की

अनघ काव्य में गीत शैली और नाटकीय प्रणाली पर उनकी पकड़ को हम देख सकते हैं

द्वापर की रचना में हम गुप्त जी द्वारा आत्मोद्गार प्रणाली को देख सकते हैं

यशोधरा की रचना मैथिलीशरण गुप्त जी ने कई शैलियों को मिलाकर की नाटक गीत प्रबंध पद्य और गद्य

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की काव्य शैली में उनका व्यक्तित्व झलकता है और पूर्ण प्रवाह देखने को मिलता है भावों की अभिव्यक्ति बहुत ही सटीक रूप से हुई है प्रारंभ की कुछ कविताओं में उनकी भाषा तत्सम रही है संस्कृत का अत्यधिक प्रभाव उनकी रचनाओं पर रहा परंतु प्राकृत और प्रांतीय भाषाओं का भी प्रभाव उनकी रचनाओं पर रहा

पौराणिक इतिहास की कथाओं को लेकर उन्होंने काव्य रचनाएं की संस्कृत महाकाव्य के शास्त्रीय लक्षणों को अपनाने की कोशिश की जैसे आरंभ में मंगलाचरण और सरस्वती वंदना तथा 7 से अधिक सर्ग प्रत्येक वर्ग में मैं छंद आदि उन्होंने ऋतु वर्णन पुरुषार्थ चतुष्टय गिरी प्रांत सरिता वर्णन वस्तु संगठन चरित्र चित्रण भाव वर्णन युगधर्म वर्णन तथा रस आदि संस्कृत महाकाव्य का अनुकरण किया गुप्तजी ने संस्कृत के गण वृक्षों को अपनाने का प्रयास किया

जी की कविता पर राष्ट्रीयता और गांधीवाद विचारधाराओं की प्रधानता रही उन्होंने इतिहास के गौरव में अतीत को और भारतीय संस्कृति को महत्व दिया इसके साथ ही उन्होंने पारिवारिक जीवन को भी अपनी रचनाओं में रखा नारी पात्रों के बारे में बहुत ही गहराई से और भावनात्मक रचनाएं जीने की प्रबंध काव्य और मुक्तक दोनों में ही उन्होंने रचनाएं की शब्द शक्तियां तथा अलंकारों के सक्षम प्रयोग के साथ मुहावरों का भी प्रयोग उन्होंने किया

काव्य जगत में योगदान

मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से भारतीय नवजागरण और राष्ट्रीयता की भावना का प्रचार प्रसार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया गुप्तजी ने भारतीय जनता को उसकी समग्रता से समझा पहचाना था कविता के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से नेतृत्व किया था उनकी कविताएं नई कविता और उसके बाद आने वाली कविताओं में आज भी अग्रणी है मैथिलीशरण गुप्त जी को आधुनिक काल का तुलसीदास कहा जा सकता है गुप्तजी ने जन भाषा को साहित्यिक भाषा बनाने का सफल प्रयोग किया अतीत और नवीन दोनों ही युगों को गुप्त जी ने बहुत ही निपुणता से जोड़ा सामंतवादी और साम्राज्यवादी जनविरोधी विचारधाराओं के विरोध का सूत्रपात मैथिलीशरण गुप्त जी ने किया

भारत भारती

मैथिलीशरण गुप्त जी के लिए देशभक्ति का अर्थ था प्रेम भक्ति और मातृभूमि के प्रति पावन पूजन अपने देश के जी से गर्वित महसूस करते थे वेद उपनिषद रामायण महाभारत गीता पुराण अर्थ वक्ता राम सीता उर्मिला कृष्ण राधा बुद्ध यशोधरा चैतन्य महाप्रभु विष्णु प्रिया उनकी कविताओं में देखा जा सकता है देश की संस्कृति परंपरा स्मृति जातीय चेतना भक्ति की चेतना से वे ओत प्रोत थे भारत भारती भारतेंदु द्विवेदी युग के साथ छायावाद का भी असर धारण किए हुए हैं कविता देश के राग अनुराग का आधार हैयह कविता जिस समय लिखी गई उस समय प्राविनता से मुक्ति के लिए साहित्य क्षेत्र से विचार उदित होने लगे थे इसी समय कभी उन्हें इतिहास संस्कृति का गौरव कौन पढ़ना शुरू किया थाआचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका ने कहा कि यह काव्य वर्तमान हिंदी साहित्य में युगांतर उत्पन्न करने वाला है इसमें वह संजीवनी शक्ति है जो किसी भी जाति को उत्साह जागरण की शक्ति का वरदान दे सकती है

महात्मा गांधी ने उन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से सम्मानित किया

राष्ट्रीय कवि का स्त्री विमर्श

गुप्तजी ने भारत भारती में महिलाओं की उन्नति पर अधिक बल दिया उनका कहना था कि हमारी शिक्षा तब तक काम नहीं आएगी जब तक महिलाएं शिक्षित नहीं होंगी

विद्या हमारी भी ना तब तक काम में कुछ आएगी

अर्धांगिनियों को भी सुशिक्षा दी न जब तक जाएगी

गुप्तजी ने प्राचीन काल की ऐसी कथा और चित्रों को अपने काव्य में चित्रित किया जिससे वर्तमान में प्रेरणा ली जा सकती है उन्होंने पतनशील परंपराओं का विरोध किया

गुप्तजी ने पौराणिक कथाओं को अपनी बहुत सारी कथाओं का आधार बनाया परंतु उन कथाओं में जहां भी उन्हें लगा कि नारी पात्र के चित्र में न्याय नहीं हुआ है वहां उन्होंने परंपरा से अलग हटकर आधुनिक समाज के लिए अपनी कविताओं के नारी पात्र को इस तरह से प्रस्तुत किया कि वह आने वाले स्वतंत्रोतर समाज में नारी की स्थिति को सुदृढ़ करें

गुप्तजी ने अपनी रचनाओं में नारी के महत्व को स्थापित करने उसे समाज में उचित स्थान दिलाने उसके विभिन्न रूपों को जानने समझने उसकी अपनी गहरी संवेदना को दृष्टि देने में साहित्य जगत में सर्वोपरि स्थान रखते हैं

गुप्त जी का मानना था कि व्यक्ति और समाज की श्रेष्ठता का मानदंड है नारी उसका पीड़ित अपमानित किया अभिशप्त हो ना पूरी संस्कृति और समाज का ही अभिशप्त होना है पुरुष से बहुत ऊपर स्थान दिया था उन्होंने नारी को द्वापर काव्य में उन्होंने लिखा

एक नहीं दो-दो मात्राएं

नर से भारी नारी

भारत भारती में वे लिखते हैं

ऐसी उपेक्षा नारियों की जब स्वयं हम कर रहे

अपना किया अपराध उनके शीष पर हम घर रहे

भागे ना फिर हमसे भला क्यों दूर सारी सिद्धियां

पाती स्त्रियां आदर जहां रहती वहां सब ऋद्धियां

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी में लक्ष्मण पत्नी उर्मिला के चरित्र को ही परंपरा और इतिहास से अलग सशक्त छवि में लिखा बल्कि उन्होंने समाज की ऐसी अनेक उपेक्षित नारी चरित्रों को उनके महान त्याग और मानव कल्याण की दूरी होने के बावजूद सम्मान न मिलने के कारण तलाश करके उन्हें सम्मानित किया

साकेत में उन्होंने कई कई के युग युग से कलंकित व्यक्तित्व को उभारा गौतम बुध की पत्नी यशोधरा के त्याग करो ना और उदात्ता की प्रतिमूर्ति के रूप में विख्यात किया चैतन्य महाप्रभु की पत्नी यशोधरा का संघर्ष सेवा और त्याग उन्होंने विष्णु प्रिया नामक काव्य में स्मरण करवायाइसके अलावा अनेक स्त्रियां हैं जिन्हें कवि की संवेदना का स्पर्श प्राप्त हुआ

महाकवि की यह सुप्रसिद्ध पंक्तियां

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी

आंचल में है दूध आंखों में पानी

यह कहीं से भी यशोधरा के लिए नहीं कहा गया यह युग को कवि ने एक आदर्श दिया कि नारी को किस तरह से ना देखें

इसी तरह अपनी कविता विष्णुप्रिया में उन्होंने लिखा रो-रोकर मरना ही नारी लिखा लाई है

यह कहीं से भी यशोधरा के लिए नहीं था यह उन्होंने समाज की हर एक नारी के लिए लिखा था

उमा को अर्थात पार्वती को विदा करते समय उनकी मां कहती हैं

कत विधि सृजी नारी जग माहीं

पराधीन सपनेहु सुख नाही

क्या यह पीड़ा महादेव की अर्धांगिनी उमा के लिए हो सकती है नहीं कभी नहीं यह हर उस साधारण घर की विवाह के बाद विदा होती हुई बेटी के मां की पीड़ा के रूप में कहा जहां नारी विवाह के बाद अपनी सारी स्वतंत्रता भूलकर पराधीन जीवन व्यतीत करती है और उसे शायद मुश्किल से ही सुख प्राप्त हो पाता है

उर्मिला के लिए उन्होंने लिखा

उर्मिला कहां है हाय बहू

तू रघुकुल की असहाय बहू

डूब बचने लक्ष्मी पानी में सती आग में पैठ

जिये उर्मिला करें तपस्या सहे सभी घर बैठ

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