पक्की वाली है बड़ी

आह! मुझे चोट लगी

क्यों लगती है बार-बार

जिंदगी की राहें उबड़ खाबड़ है बड़ी

कभी ऊँची ऊँची जाती है

कभी तेज ढ़लाव लुढ़काती है

बड़े-बड़े से गड्ढे़ हैं

कभी समतल सी बन जाती है



आह! काँटे में उलझ गई

क्यों उलझी हूँ बार-बार

जिंदगी की पहेली धूप छांव सी है बड़ी

कभी सपनों को तोड़ कर जाती है

कभी बिन माँगे ख्वाब सजाती है

बेरंग बंजर बन जाती है

कभी बहार सजा कर जाती है


आह! गले मुझे लगा गई

क्यों दुलारती है बार-बार

जिंदगी भी सहेली पक्की वाली है बड़ी

सीधा सच्चा राह दिखाती है

दया प्रेम सिखाती है

बड़ी सरल इसकी भाषा है

फरेब ना इसको भता है

हां !गले मुझे लगा गई

जिंदगी दुलारती है बार-बार

©2019 by Sahitya Kiran.