सच्चिदानन्‍द हीरानन्‍द वात्‍स्‍यायन 'अज्ञेय' (सन् 1911-1987 ई.)

Updated: Jul 2

१)कलगी बाजरे की


हरी बिछली घास।

दोलती कलगी छरहरे बाजरे की।


अगर मैं तुम को ललाती सांझ के नभ की अकेली तारिका

अब नहीं कहता,

या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कुंई,

टटकी कली चम्पे की, वगैरह, तो

नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है

या कि मेरा प्यार मैला है।


बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गये हैं।

देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच।


कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।

मगर क्या तुम नहीं पहचान पाओगी :

तुम्हारे रूप के-तुम हो, निकट हो, इसी जादु के-

निजी किसी सहज, गहरे बोध से, किस प्यार से मैं कह रहा हूं-

अगर मैं यह कहूं-


बिछली घास हो तुम

लहलहाती हवा मे कलगी छरहरे बाजरे की ?


आज हम शहरातियों को

पालतु मालंच पर संवरी जुहि के फ़ूल से

सृष्टि के विस्तार का- ऐश्वर्य का- औदार्य का-

कहीं सच्चा, कहीं प्यारा एक प्रतीक बिछली घास है,

या शरद की सांझ के सूने गगन की पीठिका पर दोलती कलगी

अकेली

बाजरे की।


और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूं

यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट आता है-

और मैं एकान्त होता हूं समर्पित


शब्द जादु हैं-

मगर क्या समर्पण कुछ नहीं है ?


२) कितनी नावों में कितनी बार (कविता) / अज्ञेय


कितनी दूरियों से कितनी बार

कितनी डगमग नावों में बैठ कर

मैं तुम्हारी ओर आया हूँ

ओ मेरी छोटी-सी ज्योति!

कभी कुहासे में तुम्हें न देखता भी

पर कुहासे की ही छोटी-सी रुपहली झलमल में

पहचानता हुआ तुम्हारा ही प्रभा-मंडल।

कितनी बार मैं,

धीर, आश्वस्त, अक्लांत—

ओ मेरे अनबुझे सत्य! कितनी बार...


और कितनी बार कितने जगमग जहाज़

मुझे खींच कर ले गये हैं कितनी दूर

किन पराए देशों की बेदर्द हवाओं में

जहाँ नंगे अंधेरों को

और भी उघाड़ता रहता है

एक नंगा, तीखा, निर्मम प्रकाश—

जिसमें कोई प्रभा-मंडल नहीं बनते

केवल चौंधियाते हैं तथ्य, तथ्य—तथ्य—

सत्य नहीं, अंतहीन सच्चाइयाँ...

कितनी बार मुझे

खिन्न, विकल, संत्रस्त—

कितनी बार!


३)हरी घास पर क्षण भर (कविता) / अज्ञेय

आओ बैठें

इसी ढाल की हरी घास पर।


माली-चौकीदारों का यह समय नहीं है,

और घास तो अधुनातन मानव-मन की भावना की तरह

सदा बिछी है-हरी, न्यौती, कोई आ कर रौंदे।


आओ, बैठो

तनिक और सट कर, कि हमारे बीच स्नेह-भर का व्यवधान रहे, बस,

नहीं दरारें सभ्य शिष्ट जीवन की।


चाहे बोलो, चाहे धीरे-धीरे बोलो, स्वगत गुनगुनाओ,

चाहे चुप रह जाओ-

हो प्रकृतस्थ : तनो मत कटी-छँटी उस बाड़ सरीखी,

नमो, खुल खिलो, सहज मिलो

अन्त:स्मित, अन्त:संयत हरी घास-सी।


क्षण-भर भुला सकें हम

नगरी की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट-

और न मानें उसे पलायन;

क्षण-भर देख सकें आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली,

पौधे, लता दोलती, फूल, झरे पत्ते, तितली-भुनगे,

फुनगी पर पूँछ उठा कर इतराती छोटी-सी चिड़िया-

और न सहसा चोर कह उठे मन में-

प्रकृतिवाद है स्खलन

क्योंकि युग जनवादी है।


क्षण-भर हम न रहें रह कर भी :

सुनें गूँज भीतर के सूने सन्नाटे में किसी दूर सागर की लोल लहर की

जिस की छाती की हम दोनों छोटी-सी सिहरन हैं-

जैसे सीपी सदा सुना करती है।


क्षण-भर लय हों-मैं भी, तुम भी,

और न सिमटें सोच कि हम ने

अपने से भी बड़ा किसी भी अपर को क्यों माना!


क्षण-भर अनायास हम याद करें :

तिरती नाव नदी में,

धूल-भरे पथ पर असाढ़ की भभक, झील में साथ तैरना,

हँसी अकारण खड़े महा वट की छाया में,

वदन घाम से लाल, स्वेद से जमी अलक-लट,

चीड़ों का वन, साथ-साथ दुलकी चलते दो घोड़े,

गीली हवा नदी की, फूले नथुने, भर्रायी सीटी स्टीमर की,

खँडहर, ग्रथित अँगुलियाँ, बाँसे का मधु,

डाकिये के पैरों की चाप,

अधजानी बबूल की धूल मिली-सी गन्ध,

झरा रेशम शिरीष का, कविता के पद,

मसजिद के गुम्बद के पीछे सूर्य डूबता धीरे-धीरे,

झरने के चमकीले पत्थर, मोर-मोरनी, घुँघरू,

सन्थाली झूमुर का लम्बा कसक-भरा आलाप,

रेल का आह की तरह धीरे-धीरे खिंचना, लहरें

आँधी-पानी,

नदी किनारे की रेती पर बित्ते-भर की छाँह झाड़ की

अंगुल-अंगुल नाप-नाप कर तोड़े तिनकों का समूह,

लू,

मौन।


याद कर सकें अनायास : और न मानें

हम अतीत के शरणार्थी हैं;

स्मरण हमारा-जीवन के अनुभव का प्रत्यवलोकन-

हमें न हीन बनावे प्रत्यभिमुख होने के पाप-बोध से।

आओ बैठो : क्षण-भर :

यह क्षण हमें मिला है नहीं नगर-सेठों की फैया जी से।

हमें मिला है यह अपने जीवन की निधि से ब्याज सरीखा।


आओ बैठो : क्षण-भर तुम्हें निहारूँ

अपनी जानी एक-एक रेखा पहचानूँ

चेहरे की, आँखों की-अन्तर्मन की

और-हमारी साझे की अनगिन स्मृतियों की :

तुम्हें निहारूँ,

झिझक न हो कि निरखना दबी वासना की विकृति है!


धीरे-धीरे

धुँधले में चेहरे की रेखाएँ मिट जाएँ-

केवल नेत्र जगें : उतनी ही धीरे

हरी घास की पत्ती-पत्ती भी मिट जावे लिपट झाड़ियों के पैरों में

और झाड़ियाँ भी घुल जावें क्षिति-रेखा के मसृण ध्वान्त में;

केवल बना रहे विस्तार-हमारा बोध

मुक्ति का,

सीमाहीन खुलेपन का ही।


चलो, उठें अब,

अब तक हम थे बन्धु सैर को आये-

(देखे हैं क्या कभी घास पर लोट-पोट होते सतभैये शोर मचाते?)

और रहे बैठे तो लोग कहेंगे

धुँधले में दुबके प्रेमी बैठे हैं।


-वह हम हों भी तो यह हरी घास ही जाने :

(जिस के खुले निमन्त्रण के बल जग ने सदा उसे रौंदा है

और वह नहीं बोली),

नहीं सुनें हम वह नगरी के नागरिकों से

जिन की भाषा में अतिशय चिकनाई है साबुन की

किन्तु नहीं है करुणा।


उठो, चलें, प्रिय!


४) यह दीप अकेला / अज्ञेय


» बावरा अहेरी »


यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता पर

इसको भी पंक्ति को दे दो


यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा

पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लायेगा?

यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा

यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित :


यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता पर

इस को भी पंक्ति दे दो


यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युगसंचय

यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय

यह अंकुर : फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय

यह प्रकृत, स्वयम्भू, ब्रह्म, अयुतः

इस को भी शक्ति को दे दो


यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता पर

इस को भी पंक्ति दे दो


यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,

वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा,

कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में

यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,

उल्लम्ब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा

जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय

इस को भक्ति को दे दो


यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता पर

इस को भी पंक्ति दे दो


नयी दिल्ली ('आल्प्स' कहवाघर में), 18 अक्टूबर, 1953

अज्ञेय की कविता में द्वंद और आधुनिक बोध

अज्ञेय एक ऐसे समय की कवी है जब समाज में मध्यमवर्गीय मन में कुंठा और निराशा अपना घर बना रही है औद्योगिकरण और पूंजीपति वर्गों के कारण बन रही आर्थिक विषमता की खाई बढ़ रही है अग्नि इन सभी को बहुत गहराई से समझा और अपनी कविताओं में व्यक्त किया वहीं दूसरी ओर कवि प्रकृति ग्रामीण जीवन की सहजता और जटिलता को भी रचने में उतनी ही काबिलियत रखते हैं कवि के स्वयं के अवसादो वह दुखों को समाज के साथ जोड़कर व्यक्त किया इसीलिए अज्ञेय की कविताओं में जीवन का सत्य और यथार्थ भर कर सामने आता है अज्ञेय ने अपने व्यक्तिगत दुखों को और पीड़ाओं को कविता में उकेरा है

"और भुला दिया गया बस

बीते साल के सिले कैलेंडर की

एक बस तारीख

जो हर साल आता है"

अज्ञेय एक ऐसे इंसान के भावों की अभिव्यक्ति की है जो आधुनिक समाज में है और आज के दौर की समस्याओं से जूझ रहा है एक ओर जहां उन्होंने पुरानी मान्यताओं को लेकर संशय बताया है वहीं भीड़ में रहकर भी अकेले व्यक्ति का चित्रण किया है अज्ञेय की कविता जीवन के प्रति आत्म चेतस व्यक्ति की अभिक्रिया है उनकी कविता को एक ढांचे में नहीं बांधा जा सकता है विविधता लिए हुए कविताएं हैं अग्नि कई पुराने कविता के तरीकों बिंबों उपमानों को त्याग दिया और नयापन लेकर आए

अज्ञेय नहीं कविता के प्रसिद्ध कवि हैं 1951 ईस्वी में एक पत्रिका आई "दूसरा सप्तक" इसके संपादक अज्ञेय जी थे इस पत्रिका व "नए पत्ते" तथा "नई कविता" जैसे कई पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से नई कविता को पहचान मिलने लगी ऐसा समय था जब कविताएं छायावाद की मान्यताओं से पूरी तरह अपने को पृथक नहीं कर पाई थी कविताओं में जब भी नया प्रयोग किया जाता तो उसकी भरसक आलोचना होती थी अज्ञेय ने भी प्रयोग के संबंध में कुछ इस तरह से अपना मत सामने रखा


"प्रयोग अपने आप में ईस्ट नहीं है वरन वह दोहरा साधन है एक तो वह इस सत्य को जानने का साधन है जिसे कवि प्रेषित करता है दूसरे वह उस प्रेषण क्रिया को और उसके साधनों को जानने का साधन है'


नई कविता के काल आने तक भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी सभ्यता का व्यापक असर शुरू हो चुका था पश्चिमी सभ्यता के असर कविताओं पर भी हो रहा था और उसकी भर्त्सना आलोचक करने लगे थे इसका कारण था कि नई कविता में निराशा कुंठा क्षणिक प्रवृत्ति की झलक आलोचकों को पसंद नहीं आ रही थी परंतु नई कविता का अपना एक अलग ही शिल्प है जहां पर कवि नई नई विधाओं की खोज करते रहे हैं ऐसे ही सभी नई मान्यताओं के ध्वजारोहण रहे कवि अज्ञेय

"तू अंतहीन काल के लिए फलक पर ढक दें

क्योंकि यह मांग मेरी मेरी मेरी है कि प्राणों के

एक जिस बुलबुले की ओर मैं हुआ हूं उदग्र वह

अंतहीन काल तक मुझे खींचता रहे….. ‌‌"

यह काव्यांश 'बना दे चितेरे" काव्य से उद्धृत है कवी की जिजीविषा नए मानववाद जीवन बोध और काव्य बोध की सजगता यहां साफ समझ में आती है

काव्य विशेषता

अज्ञेय की उपस्थिति बहुत ही विवादास्पद रही उनके काव्य को और उनकी स्वतंत्र रचना शीलता को तथा उनकी प्रतीकों को समझना लोगों के लिए काफी समय तक मुश्किल रहा आधुनिक काव्य में अगेन ए संस्कारी होने को आधुनिकता माना है अज्ञेय ने संस्कार और संवेदना में अंतर स्पष्ट किया उनके अनुसार संवेदना पहले है और संस्कार बाद में स्वतंत्र उत्तर हिंदी साहित्य में अज्ञेय ने नई कविता शब्द और नए कवि संबोधन की शुरुआत की अज्ञेय के अनुसार प्रयोगवादी कवियों को नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जिससे जो भी तरीका या माध्यम उचित जान पड़ता है उसे उसका प्रयोग करते हुए अपने आप को अभिव्यक्त करने की आजादी होनी चाहिए उसे इसी विशेषण में नहीं बांधना चाहिए

जीवन के भावों को अज्ञेय बिल्कुल ही अलग ढंग से देखते थे उनके लिए प्रेम दुख मुक्ति मृत्यु यह सब सामान्य नहीं होता था प्रकृति चांदनी आकाश पूर्णिमा जैसा सामान्य जन सूची के आगे बिल्कुल ही उसे अलग ढंग से सोचते थे आधुनिकता उनके लिए दर्द देने वाला था समय के साथ हर चीज को बदला हुआ ही दिखाते थे अभी एक क्रांतिकारी कवि थे परंपरा से हटकर काम करने की चेस्टर में लगे रहते थे अपने अनुभवों और विचारों को वह स्वतंत्र रूप से व्यक्त करते थे वे सदैव अपने व्यक्तित्व की खोज में लगे रहते थे अपने आप में एक ऐसे व्यक्ति की खोज करती थी जो हर तरह की कुंठा से रहित हो आधुनिक बोध और संवेदना उनकी कविता में होती थी प्रकृति और प्रेम को वह बिल्कुल ही नए रूप में प्रस्तुत करते थे आगे की प्रेमी भी भागता का नियंत्रण बना रहता था प्रेम में भी वह सब कुछ नहीं खो देना चाहते थे उन्होंने सौंदर्य को एक नया आयाम दिया सागर उनके लिए कभी बंधन होता था तो कभी मुक्ति सौंदर्य कभी उन्हें मुक्त रखता तो कभी तटस्थ

काव्य शिल्प की विशेषता

काव्य शिल्प में आगे सिद्ध थे इस कला में बहुत ही सतर्क सजग और दक्ष थे उनके शब्द बहुत कम होते थे लेकिन बहुत ही स्पष्ट और अर्थपूर्ण होते थे उनकी कविताएं शक्तिशाली और अपनी सीमा को बताती थी उनके काव्य पर अंग्रेजी का भी प्रभाव देखने को मिलता तत्सम और तद्भव शब्दों का प्रयोग भी बहुत ही खूब इसे किया जाता पुराने काव्य शिल्प को अभी महत्व नहीं देते थे उनके अनुसार कविता दिल को छूने चाहिए पाठक की चेतना को कविता छू जानी चाहिए कविताओं को सीमा में बांधना सही नहीं उनके अनुसार कविता गेय होनी चाहिए गीत की झांसी की बिना भी लैया संगीत की रचना की जा सकती है यह उन्होंने अपनी लंबी कविता असाध्य वीणा में प्रगीततत्व का उपयोग करके बताया

अगेय की कविता में नाटकीयता है असाध्य वीणा में प्रियंवदा आना उनका संकोच वीणा को साधना संभालना वीणा की झंकृति सभा का मौन विलक्षण सन्नाटा प्रथम अंश में गति और स्थिरता के द्वंद में चित्रात्मकता द्वितीय अंश में कोमल आत्मीय संवाद और तीसरे अंश में विस्मय यह सभी प्रयोग अज्ञेय की काव्य शिल्प कौशल को दिखाते हैं

काव्य भाषा की विशेषता

कभी आगे की भाषा पर पकड़ बहुत अच्छी थी भाषा के साथ नए-नए प्रयोग भी करते थे उनका मानना था कि मनुष्य आदिकाल से हैं अपने स्थान धर्म और जरूरत के हिसाब से अपनी भाषा का निर्माण करता रहा है और उसकी भाषा है उसके आसपास एक संसार बना देती है भाषा के अनुसार ही उसके जीवन की व्यवस्थाएं उसके चारों तरफ बुनी जाती है एक और जहां कवि अज्ञेय ने भाषाओं में नए-नए प्रयोग करके हिंदी साहित्य के लिए एक उपलब्धि साबित की वही उनके प्रयोग साहित्य के लिए एक चुनौती भी बनी उनकी साहित्यिक सफर में अलग-अलग पढ़ाओ पर उनकी भाषा के रंग और रूप बदलते रहे खुद अज्ञ जी का व्यक्तित्व भी विरोधाभास ओं से युक्त ही रहा कभी तो उनकी भाषा बहुत ही सरल हो जाती है और कभी उनकी भाषा में जटिलता दिखाई पड़ती है अधिकतर समय वह सीधी सीधी बात ना कह कर व्यंग का माध्यम अपनाते थे परंतु व्यंग ही सिर्फ उनका माध्यम था ऐसा नहीं कहा जा सकता कभी-कभी एकदम से अभिधायुक्त भी हो जाते थे अज्ञेय की कविताओं की विशेषता उनका शब्द चयन है बिना मतलब के अधिक शब्दों का प्रयोग कभी नहीं करते थे उनकी कविताओं में बहुत ही सधे हुए शब्दों का प्रयोग रहा है कम शब्दों में ही उनकी कविता में असाधारण अभिव्यक्ति की क्षमता रहती थी और कम शब्दों में ही उनका सृजन एक नई दिशा प्रदान करता रहा नहीं कविता के कवियों में अज्ञेय का नाम प्रमुख हैं नए-नए प्रतीक और बिंब से नए नए प्रयोग किए उन्होंने तत्सम तद्भव देशज तथा ग्रामीण शब्दों का प्रयोग बहुत ही कलात्मक रूप से किया कभी-कभी तो उनकी कविताओं में बड़े अटपटे से शब्द भी प्रयोग हुए कविताओं में एक नवीनता भर दी कभी आगे का साहित्यिक सफर परिवर्तनों से भरा रहा वह कभी भी कहीं ठहरा नहीं समय के अनुसार सदैव उसमें परिवर्तन आता रहा इस तरह कवि अज्ञेय हमेशा ही अनुकरणीय हैं

अज्ञेय की कविता प्रयोगवाद और नई कविता का दस्तावेज

कवि अज्ञ एक आधुनिक कवि रहे उनकी कविताओं में प्रयोगवाद देखने को मिला नई कविता की प्रगतिवादी कभी भी आगे रहेइसका अर्थ यह नहीं है कि कभी नहीं बिल्कुल ही अजीब सी नई चीजों का प्रयोग किया हो उनकी कविताओं में सामाजिकता थी सृजनशीलता थी सजगता थी अज्ञेय की कविताओं की गंभीरता में कहीं भी ऐसा नहीं था कि कोई ऐसी चीज की खोज हो जिसका कुछ पता ही ना हो बल्कि उनकी कविता में सामाजिक और व्यक्ति द्वंद मिलता है

रोमांटिक तथा आधुनिक दृष्टि का द्वंद

कवि अज्ञेय की कविताओं में रोमांटिक तथा आधुनिक के बीच अगर द्वंद था तो वहीं दूसरी ओर परंपरा और आधुनिकता के बीच भी द्वंद था कहीं से भी आगे अपनी कविताओं में रोमांटिक की अवहेलना नहीं की उनकी कविताओं में आत्म चेतना और खास तरह का आत्म बोध था जिसने उनकी कविताओं को आधुनिक बोध प्रदान किया जहां एक और कवि अध्याय सदियों से चली आ रही परंपरा और को स्वीकारते थे तो वहीं दूसरी ओर वे गलत परंपरा का विरोध भी करते थेइससे कभी-कभी कविताओं में एक तनाव उत्पन्न होता था और कविता आधुनिक अनुभव तक पहुंचती थी और यह एक कवि अज्ञेय को एक आधुनिक भाव बोध का कवि बनाता हैआधुनिक कवि की श्रेणी में होते हुए भी नई कविताओं में प्रयोग करते हुए भी आगे की कई कविताओं में छायावाद असर भी दिखाई पड़ता है इसीलिए उनकी कविताओं में कई बार मिली जुली प्रतिक्रिया आती है

व्यक्तित्व तथा सामाजिक सरोकार : संबंध और द्वंद

अज्ञ साठोत्तरी कविता के बाद की कविताओं के साथ जुड़ाव अनुभव नहीं करते थे नई कविताओं की कवि के रूप में ही वे जाने जाते हैं तीसरा सप्तक को नई कविता का प्रतिनिधि संग्रह माना जाता है 1960 के बाद की हिंदी कविता मोहभंग की सूचक बनी चौथी सप्तक के प्रकाशन का आगे की नई कविता पर कोई प्रभाव नहीं रहा नहीं कविता वाले दौर के द्वंद व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक दायित्व का द्वंद अज्ञेय की कविताओं में रहा अज्ञेय की कविताएं सामाजिक प्रवाह में घुलमिल कर सृजन करती रही और अपनी अद्वितीयता और विशिष्टता बनाई रही

आत्मबोध और जीवन दृष्टि

अभी का नाम नई कविता के कवियों में अग्रिम है नहीं कविता को असली पहचान दूसरा सप्तक के प्रकाशन से ही मिली अज्ञ उस समय के कवि हैं जिस समय छायावाद की मान्यताएं पूरी तरीके से गई नहीं थी और प्रयोग शब्द को पूरी तरह से अपनाया नहीं गया था

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात बदलते सामाजिक ढांचे में व्याप्त निराशा कुंठा छुड़वा दी प्रवृत्ति और पश्चिमी साहित्य की नकल का आरोप नई कविता शिल्प पर लगा

बदलती आर्थिक परिवेश में मध्यम वर्गीय समाज का उदय हुआ और औद्योगिकरण के साथ हैं असंगत भरी सभ्यता का विकास होने लगा कवि मन एक और जहां विकास की ओर अग्रसर शहरी जीवन को देखता वहीं दूसरी ओर ग्राम में जीवन इस सच्चाई को भी नहीं भूलता अधिकतर कविताएं इन दोनों के बीच तालमेल बिठाने में ही रही जहां एक ओर अपने पुरानी परंपराओं से जुड़े रहने की कुल आहट थी वहीं दूसरी ओर कुछ मान्यताएं जो विकास के मार्ग में रुकावट ला रही थी उन से बाहर निकलने के लिए भी एक तड़प थी ऐसे परिस्थितियों में मानव अपने आप को अकेला महसूस कर रहा ऐसे में अज्ञेय की कविताएं भावनात्मक रूप से जटिल मानव का प्रतिनिधित्व करती रही उनकी कविताओं में बहुत ही विविधता देखने को मिली नए-नए प्रतीकों और बिंबों का प्रयोग हुआ

जटिल सामाजिक और मानवीय मस्तिष्क की बातों को समझाने के कारण अज्ञेय की कविता अति बौद्धिकता वादी हो गई कविताओं में विचारों की अधिकता हो गई और भावुकता दब गई अज्ञेय की कविताओं में वर्तमान में ही सर्वस्व की खोज और मुक्त जीवन के मूल्यों की बातें ही ज्यादा रहीं

आगे मानती थी कि जीवन बहुत ही सुंदर है लेकिन जीवन को स्पष्ट तौर पर सामने से देखना चाहिए किसी किसी शीशे या ऐनक के पार से नहीं देखना चाहिए सिर्फ मानव मूल्यों की बातें ही नहीं प्रकृति और प्रेम भी अज्ञेय की कविताओं में प्रमुख रहा







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