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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

Updated: May 30, 2021

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म 1899 में बंगाल राज्य के महिषदल नामक रियासत के मेदिनीपुर जिले में हुआ था इनके पिता रामसहाय त्रिपाठी मूलत उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढाकोला नामक गांव के निवासी थे बचपन में ही उनकी माता जी का देहांत हो गया स्कूली शिक्षा उचित प्राप्त ना होने पर भी स्वाध्याय द्वारा उन्होंने अनेक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया पिता की मृत्यु के बाद यह पुलिस में भर्ती हो गए 14 वर्ष की छोटी अवस्था में इनका विवाह मनोहरा देवी से हुआ एक पुत्र एवं एक पुत्री के पिता बने 1918 में पत्नी के देहांत ने इन्हें तोड़ दिया आर्थिक संकटों संघर्षों से निराला का सामना होता रहा रामकृष्ण मिशन अद्वैत आश्रम बेलूर मठ गए इन्होंने दर्शन शास्त्र का अध्ययन किया और आश्रम के पत्र समन्वय का संपादन कियाअपनी पुत्री सरोज की निधन के पश्चात वे शोकाकुल को बीमारियों से जकड़ दिए गए 15 अक्टूबर 1961 को इस महान साहित्यकार में सदा के लिए इस दुनिया से विदा ले लिया

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने साहित्य के अनेक विधाओं में लिखा साहित्यिक प्रतिभा के धनी थे काव्य संग्रह उपन्यास कहानी संग्रह निबंध नाटक अनुवाद रेखाचित्र संपादन आदि रचनाओं का संग्रह है निराला जी के काव्य में छायावाद ही नहीं अपितु प्रगतिवाद तथा प्रयोगवादी काव्य की विशेषताएं मिलती हैं जहां एक ओर वे कबीर पंथ के करीब लगते हैं वहीं दूसरी और समकालीन कवियों के भी आदर्श रहे उनकी कविताओं की यह विशेषता रही कि वे किसी सीमा में नहीं बांधी जा सकती

भाषा शैली तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली युक्त रही बंगाल में समय व्यतीत होने के कारण उसका प्रभाव रहा और संगीत में गेय शैली युक्त काव्य रही

बादल राग कविता अनामिका काव्य से ली गई है बादल जहां एक ओर निर्माण का कारण है वहीं दूसरी ओर विध्वंस का भी कारण है बादल किसानों के लिए उल्लास का कारण है तो मजदूरों के लिए क्रांति का दूत है बादल शोषित वर्ग का हितैषी है वही पूंजीपति वर्ग भयभीत है बादल से बादल के आने से किसानों के खेत लहलहा उठते हैं वही मजदूरों को काम मिलता है जिससे आर्थिक विषमता मिलती है


कविता


1) बादल राग


झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर। राग अमर! अम्बर में भर निज रोर! झर झर झर निर्झर-गिरि-सर में, घर, मरु, तरु-मर्मर, सागर में, सरित-तड़ित-गति-चकित पवन में, मन में, विजन-गहन-कानन में, आनन-आनन में, रव घोर-कठोर- राग अमर! अम्बर में भर निज रोर! अरे वर्ष के हर्ष! बरस तू बरस-बरस रसधार! पार ले चल तू मुझको, बहा, दिखा मुझको भी निज गर्जन-भैरव-संसार! उथल-पुथल कर ह्रदय- मचा हलचल- चल रे चल- मेरे पागल बादल! धँसता दलदल हँसता है नद खल्-खल् बहता, कहता कुलकुल कलकल कलकल। देख-देख नाचता ह्रदय बहने को महा विकल-बेकल, इस मरोर से- इसी ओर से- सघन घोर गुरु गहन रोर से मुझे गगन का दिखा सघन वह छोर! राग अमर! अम्बर में भर निज रोर! सिन्धु के अश्रु! धारा के खिन्न दिवस के दाह! विदाई के अनिमेष नयन! मौन उर में चिह्नित कर चाह छोड़ अपना परिचित संसार- सुरभि का कारागार, चले जाते हो सेवा-पथ पर, तरु के सुमन! सफल करके मरीचिमाली का चारु चयन! स्वर्ग के अभिलाषी हे वीर, सव्यसाची-से तुम अध्ययन-अधीर अपना मुक्त विहार, छाया में दुःख के अन्तःपुर का उद्घाचित द्वार छोड़ बन्धुओ के उत्सुक नयनों का सच्चा प्यार, जाते हो तुम अपने पथ पर, स्मृति के गृह में रखकर अपनी सुधि के सज्जित तार। पूर्ण-मनोरथ! आए- तुम आए; रथ का घर्घर नाद तुम्हारे आने का संवाद! ऐ त्रिलोक जित्! इन्द्र धनुर्धर! सुरबालाओं के सुख स्वागत। विजय! विश्व में नवजीवन भर, उतरो अपने रथ से भारत! उस अरण्य में बैठी प्रिया अधीर, कितने पूजित दिन अब तक हैं व्यर्थ, मौन कुटीर। आज भेंट होगी- हाँ, होगी निस्संदेह आज सदा-सुख-छाया होगा कानन-गेह आज अनिश्चिचत पूरा होगा श्रमिक प्रवास, आज मिटेगी व्याकुल शायामा के अधरों की प्यास। सिन्धु के अश्रु! धरा के खिन्न दिवस के दाह! बिदाई के अनिमेष नयन! मौन उर में चिन्हित कर चाह छोड़ अपना परिचित संसार-- सुरभि के कारागार, चले जाते हो सेवा पथ पर, तरु के सुमन! सफल करके मरीचिमाली का चारु चयन। स्वर्ग के अभिलाषी हे वीर, सव्यसाची-से तुम अध्ययन-अधीर अपना मुक्त विहार, छाया में दुख के अंतःपुर का उद्घाटित द्वार छोड़ बन्धुओं के उत्सुक नयनों का सच्चा प्यार, जाते हो तुम अपने रथ पर, स्मृति के गृह में रखकर अपनी सुधि के सज्जित तार। पूर्ण मनोरथ! आये-- तुम आये; रथ का घर्घर-नाद तुम्हारे आने का सम्वाद। ऐ त्रिलोक-जित! इन्द्र-धनुर्धर! सुर बालाओं के सुख-स्वागत! विजय विश्व में नव जीवन भर, उतरो अपने रथ से भारत! उस अरण्य में बैठी प्रिया अधीर, कितने पूजित दिन अब तक हैं व्यर्थ, मौन कुटीर। आज भेंट होगी-- हाँ, होगी निस्सन्देह, आज सदा सुख-छाया होगा कानन-गेह आज अनिश्चित पूरा होगा श्रमित प्रवास, आज मिटेगी व्याकुल शायामा के अधरों की प्यास। उमड़ सृष्टि के अन्तहीन अम्बर से, घर से क्रीड़ारत बालक-से, ऐ अनन्त के चंचल शिशु सुकुमार! स्तब्ध गगन को करते हो तुम पार! अन्धकार-- घन अन्धकार ही क्रीड़ा का आगार। चौंक चमक छिप जाती विद्युत तडिद्दाम अभिराम, तुम्हारे कुंचित केशों में अधीर विक्षुब्ध ताल पर एक इमन का-सा अति मुग्ध विराम। वर्ण रश्मियों-से कितने ही छा जाते हैं मुख पर-- जग के अंतस्थल से उमड़ नयन पलकों पर छाये सुख पर; रंग अपार किरण तूलिकाओं से अंकित इन्द्रधनुष के सप्तक, तार; -- व्योम और जगती के राग उदार मध्यदेश में, गुडाकेश! गाते हो वारम्वार। मुक्त! तुम्हारे मुक्त कण्ठ में स्वरारोह, अवरोह, विघात, मधुर मन्द्र, उठ पुनः पुनः ध्वनि छा लेती है गगन, श्याम कानन, सुरभित उद्यान, झर-झर-रव भूधर का मधुर प्रपात। वधिर विश्व के कानों में भरते हो अपना राग, मुक्त शिशु पुनः पुनः एक ही राग अनुराग। निरंजन बने नयन अंजन! कभी चपल गति, अस्थिर मति, जल-कलकल तरल प्रवाह, वह उत्थान-पतन-हत अविरत संसृति-गत उत्साह, कभी दुख -दाह कभी जलनिधि-जल विपुल अथाह-- कभी क्रीड़ारत सात प्रभंजन-- बने नयन-अंजन! कभी किरण-कर पकड़-पकड़कर चढ़ते हो तुम मुक्त गगन पर, झलमल ज्योति अयुत-कर-किंकर, सीस झुकाते तुम्हे तिमिरहर-- अहे कार्य से गत कारण पर! निराकार, हैं तीनों मिले भुवन-- बने नयन-अंजन! आज ¶याम-घन ¶याम छवि मुक्त-कण्ठ है तुम्हे देख कवि, अहो कुसुम-कोमल कठोर-पवि! ¶ात-सहरुा-नक्षत्र-चन्द्र रवि संस्तुत नयन मनोरंजन! बने नयन अंजन! (तिरती है समीर-सागर पर अस्थिर सुख पर दुःख की छाया- जग के दग्ध ह्मदय पर निर्दय विप्लव की प्लावित माया- यह तेरी रण-तरी भरी आकांक्षाओं से, घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर उर में पृथ्वी के, आ¶ााओं से नवजीवन की, ऊँचा कर सिर, ताक रहे है, ऐ विप्लव के बादल!) शब्दार्थ-तिरती-तैरती।समीर-सागर-वायुरूपी समुद्र।अस्थिर-क्षणिक, चंचल।दग्ध-जला हुआ।निर्दय-बेदर्द।विलव-विनाश।प्लावित-बाढ़ से ग्रस्त।रण-तरी-युद्ध की नौका।माया-खेल।आकांक्षा-कामना।भेरी-नगाड़ा।सजग-जागरूक।सुप्त-सोया हुआ।अंकुर-बीज से निकला नन्हा पौधा।उर-हृदय।ताकना-अपेक्षा से एकटक देखना।

फिर-फिर! बार-बार गर्जन वर्षण है मूसलधार, ह्मदय थाम लेता संसार, सुन-सुन घोर वज्र हुँकार। अ¶ानि-पात से ¶ाायित उन्नत ¶ात-¶ात वीर, क्षत-विक्षत हत अचल-¶ारीर, गगन-स्पर्¶ाी स्पद्र्धा-धीर। हँसते है छोटे पौधे लघुभार- ¶ास्य अपार, हिल-हिल - खिल-खिल, हाथ मिलाते, तुझे बुलाते, विप्लव-रव से छोटे ही है ¶ाोभा पाते।

शब्दार्थ-वर्षण-बारिश।मूसलधार-जोरों की बारिश।हृदय थामना-भयभीत होना।घोर-भयंकर।वज्र-हुंकार-वज्रपात के समान भयंकर आवाज़।अशनि-पात-बिजली गिरना।शापित-शाप से ग्रस्त।उन्नत-बड़ा।शत-शत-सैकड़ो।विक्षप्त-घायल।हत-मरे हुए।अचल-पर्वत।गगन-स्पर्शी-आकाश को छूने वाला।स्पद्र्धा –धीर-आगे बढ़ने की होड़ करने हेतु बेचैनी।लघुभार-हलके।शस्य-हरियाली।अपार-बहुत।रव-शोर। अट्टालिका नही है रे

विप्लव-रव’ से तात्पर्य है-क्रांति का स्वर। क्रांति का सर्वाधिक लाभ शोषित वर्ग को ही मिलता है

स काव्यांश में छोटे-छोटे पौधों को शोषित वर्ग के रूप में बताया गया है। इनकी संख्या सर्वाधिक होती है। ये क्रांति की संभावना से प्रसन्न होते हैं। ये हाथ हिला-हिलाकर क्रांति का आहवान करते हुए प्रतीत होते हैं। आतंक-भवन, सदा पंक पर ही होता जल-विप्लव प्लावन, क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से सदा छलकता नीर, रोग-¶ाोक में भी हँसता है ¶ौ¶ाव का सुकुमार ¶ारीर।

(रुद्ध कोष, है क्षुब्ध तोष, अंगना-अंग से लिपटे भी आतंक-अंक पर काँप रहे हैं धनी, वज्र-गर्जन से, बादल! त्रस्त नयन-मुख ढाँप रहे है। जीर्ण बाहु, है ¶ाीर्ण ¶ारीर तुझे बुलाता कृषक अधीर, ऐ विप्लव के वीर! चूस लिया है उसका सार, हाड़ मात्र ही है आधार, ऐ जीवन के पारावार)

प्रस्तुत काव्यांश में कवि कह रहे हैं कि अन्याय व अत्याचार के कारण किसान शक्तिहीन हो गए हैं वह शरीर से कमजोर हो गए हैं अब वे सहन नहीं करना चाहते इसलिए बादल का आह्वान कर रहे हैं कि वह प्रलयंकारी क्रांति लाए और उनकी गरीबी दूर करें शक्तिहीन भुजाओं और हड्डियों के ढांचे जैसे शरीर से किसान शोषण का और मुकाबला नहीं कर सकते इसीलिए हे जीवन दाता बादल बरसो और गरीबी दूर करो

कविता की विशेषता है कि कवि ने किसान की दयनीय दशा का सजीव चित्रण किया है इस कविता में कवि ने विद्रोह की भावना का वर्णन किया है तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है दिए गए काव्यांश में मुक्तक छंद है संबोधन शैली का भी प्रयोग है चित्रात्मक शैली भी है


शब्दार्थअट्टालिकाअटारी, महल।आतंकभवन-भय का निवास।यक-कीचड़।प्लावन-बाढ़।क्षुद्र-तुच्छ।प्रफुल-खिला हुआ, प्रसन्न।जलज-कमल।नीर-पानी। शोक-दुख।शैशव-बचपन।सुकुमार-कोमल।रुदध-रुका हुआ।कोष-खजाना।क्षुब्ध-कुद्ध।तोष-शांति।अंगना-पत्नी।अंग-शरीर।अक-गोद।वज्र-गर्जन-वज्र के समान गर्जन।त्रस्त-भयभीत।जीर्ण-पुरानी, शिथिल।बहु-भुजा। शीण-कमजोर।कृषक-किसान।अधीर-व्याकुल।विप्लव-विनाश।सार-प्राण।हाड़-मात्र-केवल हड्डयों का ढाँचा।यारावार-समुद्र।

अट्टालिकाओं को आतंक-भवन इसलिए कहा गया है क्योंकि इन भवनों में शोषण के नए-नए तरीके खोजे जाते हैं। ये ऊँचे-ऊँचे भवन शोषण से लूटी गई संपत्ति के केंद्र होते हैं।

सदा पंक पर ही होता/जल-विप्लव प्लावन’ का आशय है-वर्षा से जो बाढ़ आती है वह सदा कीचड़-भरी धरती को ही डुबोती है। अर्थात शोषण की मार सबसे अधिक दबे-कुचले और गरीबों को ही झेलनी पड़ती है

(i)निर्दय विप्लव-विनाश को अधिक निर्मम व विनाशक बताने हेतु ‘निर्दय’ विशेषण।

(ii)दग्ध हृदय-दुख की अधिकता व संतप्तता हेतु’दग्ध’विशेषण।

(iii)सजग-सुप्त अंकुर-धरती के भीतर सोए, किंतु सजग अंकुर-हेतु ‘सजग-सुप्त’ विशेषण।

(iv)वज्रहुंकार-हुंकार की भीषणता हेतु ‘वज्र’ विशेषण।

(v)गगन-स्पर्शी-बादलों की अत्यधिक ऊँचाई बताने हेतु ‘गगन’।

(vi)आतंक-भवन-भयावह महल के समान आतंकित कर देने हेतु।

(vii)त्रस्त नयन-आँखों की व्याकुलता।


(viii)जीर्ण बाहु-भुजाओं की दुर्बलता।

(ix)प्रफुल्ल जलज-कमल की खिलावट।

(x)रुदध कोष-भरे हुए खजानों हेतु




2) बांधो न नव इस ठांव बंधु (अर्चना)

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु! पूछेगा सारा गाँव, बंधु! यह घाट वही जिस पर हँसकर, वह कभी नहाती थी धँसकर, आँखें रह जाती थीं फँसकर, कँपते थे दोनों पाँव बंधु! वह हँसी बहुत कुछ कहती थी, फिर भी अपने में रहती थी, सबकी सुनती थी, सहती थी, देती थी सबके दाँव, बंधु!


3)जुही की कली

विजन-वन-वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी--स्नेह-स्वप्न-मग्न-- अमल-कोमल-तनु तरुणी--जुही की कली, दृग बन्द किये, शिथिल--पत्रांक में, वासन्ती निशा थी; विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़ किसी दूर देश में था पवन जिसे कहते हैं मलयानिल। आयी याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात, आयी याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात, आयी याद कान्ता की कमनीय गात, फिर क्या? पवन उपवन-सर-सरित गहन -गिरि-कानन कुञ्ज-लता-पुञ्जों को पार कर पहुँचा जहाँ उसने की केलि कली खिली साथ। सोती थी, जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह? नायक ने चूमे कपोल, डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल। इस पर भी जागी नहीं, चूक-क्षमा माँगी नहीं, निद्रालस बंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही-- किंवा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये, कौन कहे? निर्दय उस नायक ने निपट निठुराई की कि झोंकों की झड़ियों से सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली, मसल दिये गोरे कपोल गोल; चौंक पड़ी युवती-- चकित चितवन निज चारों ओर फेर, हेर प्यारे को सेज-पास, नम्र मुख हँसी-खिली, खेल रंग, प्यारे संग

निराला की रचनाधर्मिता में एकरसता का पुट नहीं है। वे कभी भी बँधकरनहीं लिख पाते थे और न ही यह उनकी फक्कड़ प्रकृति के अनुकूल था। निराला कीजूही की कलीकविता आज भी लोगों के जेहन में बसी है। इस कविता में निराला ने अपनी अभिव्यक्ति कोछंदोंकी सीमा से परे छन्दविहीन कविता की ओर प्रवाहित किया है–

जूही की कली और पवन का मानवीकरण किया गया है। नायिका जूही की कली नायक पवन के वियोग में है। नायक पवन उसे छोड़ कर दूर मलयगिरि को पर्वत पर चला गया है। भावार्थ —कवि निराला जी कहते हैं कि जूही की कली विरह में पीड़ित नायिका का रूप है जो अपने प्रेमी पवन के विरह में तड़प रही है, जो उसे छोड़कर दूर मलयागिरी पर्वत पर चला गया है। वह अपने प्रेमी के स्वप्न में ही खोई रहती है कि कब उसका प्रेमी आएगा और उन दोनों का मिलन होगा। दूर मलयागिरि पर्वत पर गए उसके प्रेमी पवन को भी अपनी नायिका की याद आती है तो वह अपनी प्रेयसी से मिलने के लिए तड़प उठता है और वह अपनी प्रेयसी जूही की कली से मिलने के लिए चल पड़ता है। जब वह अपनी प्रेयसी के पास पहुंचता है तो उसकी प्रेयसी जूही की कली उसके सपनों में खोई निश्चल आंखें मूंदे पड़ी है। उसे अपने प्रेमी के आने की कोई सुध-बुध नही है, और वो अपने प्रेमी के स्वागत में उठती नही है तो उसके प्रेमी को लगता है कि वह जूही की कली को उसके आने का उसे कोई हर्ष नहीं हुआ और पवन क्रोधित हो जाता है। फिर पवन क्रोधित होकर अपने झोंको को तेज गति से चलाने लगता है, जिससे जूही की कली के कोमल तन पर आघात लगता है और वह हड़बड़ा कर उठ जाती है। तब अपने सामने अपने प्रेमी पवन को देखकर वह हर्ष से उल्लासित हो उठती है और फिर दोनों प्रेमी-प्रेमिकाओं के गिले-शिकवे दूर हो जाते हैं और दोनों का मिलन हो जाता है और दोनों प्रेमी-प्रेमिका प्रेम के रंग में डूब जाते हैं।


4)जागो फिर एक बार


जागो फिर एक बार! प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें अरुण-पंख तरुण-किरण खड़ी खोलती है द्वार- जागो फिर एक बार! आँखे अलियों-सी किस मधु की गलियों में फँसी, बन्द कर पाँखें पी रही हैं मधु मौन अथवा सोयी कमल-कोरकों में?- बन्द हो रहा गुंजार- जागो फिर एक बार! अस्ताचल चले रवि, शशि-छवि विभावरी में चित्रित हुई है देख यामिनीगन्धा जगी, एकटक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय, आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयी घेर रहा चन्द्र को चाव से शिशिर-भार-व्याकुल कुल खुले फूल झूके हुए, आया कलियों में मधुर मद-उर-यौवन उभार- जागो फिर एक बार! पिउ-रव पपीहे प्रिय बोल रहे, सेज पर विरह-विदग्धा वधू याद कर बीती बातें, रातें मन-मिलन की मूँद रही पलकें चारु नयन जल ढल गये, लघुतर कर व्यथा-भार जागो फिर एक बार! सहृदय समीर जैसे पोछों प्रिय, नयन-नीर शयन-शिथिल बाहें भर स्वप्निल आवेश में, आतुर उर वसन-मुक्त कर दो, सब सुप्ति सुखोन्माद हो, छूट-छूट अलस फैल जाने दो पीठ पर कल्पना से कोमन ऋतु-कुटिल प्रसार-कामी केश-गुच्छ। तन-मन थक जायें, मृदु सरभि-सी समीर में बुद्धि बुद्धि में हो लीन मन में मन, जी जी में, एक अनुभव बहता रहे उभय आत्माओं मे, कब से मैं रही पुकार जागो फिर एक बार! इस कविता में उस समय का वर्णन है, जब भारत अंग्रेजों के हाथों पराधीन था। इस कविता में कवि ने पराधीनता से निराश होकर भारतीय जन के लिये कुछ चिंतन किया है और सुप्त भारतीय जनता को उनके गौरवमयी अतीत की याद दिलाते हुए उन्हें जगाने का आह्वान किया है। कवि के अनुसार पराधीनता के उस युग में अनेक भारतीयों की अंतरात्मा सोई हुई थी। वे आलस्य और कायरता आदि से ग्रस्त थे और स्वयं को कमजोर व दीन-हीन मान चुके थे। वे चारों तरफ से निराश थे। ऐसे में कवि ने इस कविता की रचना कर भारतीयों के अंदर देशप्रेम की भावना जगाकर जोश भरने का प्रयत्न किया है और उनकी कायरता की निंदा करते हुए उनकी अंतरात्मा को जगाने का प्रयास किया है। इस कविता में कवि ने देश-प्रेम की भावना को व्यक्त करते हुए अनेक 20 महापुरुषों का उदाहरण देकर भारतीयों को जाग जाने के लिए प्रेरित किया है। इस तरह यह कविता एक प्रेरक कविता बन जाती है जो देश प्रेम को भूल बैठे भारतीयों के मन में देश प्रेम का भाव जगाने के लिए रचित की गई है।

5)राजे ने अपनी रखवाली की


राजे ने अपनी रखवाली की किला बनाकर रहा; बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं । चापलूस कितने सामन्त आए । मतलब की लकड़ी पकड़े हुए । कितने ब्राह्मण आए पोथियों में जनता को बाँधे हुए । कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाए, लेखकों ने लेख लिखे, ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे, नाट्य-कलाकारों ने कितने नाटक रचे रंगमंच पर खेले । जनता पर जादू चला राजे के समाज का । लोक-नारियों के लिए रानियाँ आदर्श हुईं । धर्म का बढ़ावा रहा धोखे से भरा हुआ । लोहा बजा धर्म पर, सभ्यता के नाम पर । ख़ून की नदी बही । आँख-कान मूंदकर जनता ने डुबकियाँ लीं । आँख खुली-- राजे ने अपनी रखवाली की ।



6)राम की शक्ति पूजा रवि हुआ अस्त ज्योति के पत्र पर लिखा अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर। आज का तीक्ष्ण शरविधृतक्षिप्रकर, वेगप्रखर, शतशेल सम्वरणशील, नील नभगर्जित स्वर, प्रतिपल परिवर्तित व्यूह भेद कौशल समूह राक्षस विरुद्ध प्रत्यूह, क्रुद्ध कपि विषम हूह, विच्छुरित वह्नि राजीवनयन हतलक्ष्य बाण, लोहित लोचन रावण मदमोचन महीयान, राघव लाघव रावण वारणगत युग्म प्रहर, उद्धत लंकापति मर्दित कपि दलबल विस्तर, अनिमेष राम विश्वजिद्दिव्य शरभंग भाव, विद्धांगबद्ध कोदण्ड मुष्टि खर रुधिर स्राव, रावण प्रहार दुर्वार विकल वानर दलबल, मुर्छित सुग्रीवांगद भीषण गवाक्ष गय नल, वारित सौमित्र भल्लपति अगणित मल्ल रोध, गर्जित प्रलयाब्धि क्षुब्ध हनुमत् केवल प्रबोध, उद्गीरित वह्नि भीम पर्वत कपि चतुःप्रहर, जानकी भीरू उर आशा भर, रावण सम्वर। लौटे युग दल। राक्षस पदतल पृथ्वी टलमल, बिंध महोल्लास से बार बार आकाश विकल। वानर वाहिनी खिन्न, लख निज पति चरणचिह्न चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न। I सायं युद्ध समाप्त होने पर जहाँ राक्षसों की सेना में उत्साह व्याप्त है वही भालु-वानर की सेना में खिन्नता है I वे ऐसे मंद और थके-हारे चल रहे हैं मानो बौद्ध स्थविर ध्यान-स्थल की ओर प्रवृत्त हों –

प्रशमित हैं वातावरण, नमित मुख सान्ध्य कमल लक्ष्मण चिन्तापल पीछे वानर वीर सकल रघुनायक आगे अवनी पर नवनीतचरण, श्लध धनुगुण है, कटिबन्ध त्रस्त तूणीरधरण, दृढ़ जटा मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वृक्ष पर, विपुल उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशान्धकार चमकतीं दूर ताराएं ज्यों हों कहीं पार।


राम की शक्ति पूजा एक ऐसी कविता है जिसमें कविता के कई विधाओं गुणों आदि को देखा जा सकता है इसमें बहुत से प्रयोग किए गए हैं इस कविता में मिथक प्रतिबिंब छंद अलंकार आदि का प्रयोग देखा जा सकता है

कविता की शुरुआत जहां बहुत ही निराश आत्मक रूप से रवि हुआ अस्त ज्योति के पत्र ऐसा कहकर होता है वही कविता में हर बार सफलता मिलने की आशा हमेशा बनी रहती है

इस कविता में 1 दिन के युद्ध का वर्णन किया है जहां एक और राजीव नयन थोड़े से हताश हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर रावण का लोचन लोहित हो रहा है (उतरा जो दुर्गम पर्वत पर नशा अंधकार चमकती दूर ताराएं ज्यों हों कहीं पार) इस अंधकार रूपी निराशा में भी आशा रूपी तारा दूर आसमान में चमक रहा है इस तरह कवि ने बताने की कोशिश की है बिंबों के माध्यम से चित्रण किया है कि चारों ओर अंधेरा है फिर भी ज्योति जल रही है

आये सब शिविर सानु पर पर्वत के, मन्थर सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदिक वानर सेनापति दल विशेष के, अंगद, हनुमान नल नील गवाक्ष, प्रात के रण का समाधान करने के लिए, फेर वानर दल आश्रय स्थल। बैठे रघुकुलमणि श्वेत शिला पर, निर्मल जल ले आये कर पद क्षालनार्थ पटु हनुमान अन्य वीर सर के गये तीर सन्ध्या विधान वन्दना ईश की करने को लौटे सत्वर, सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर, पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण भल्ल्धीर, सुग्रीव, प्रान्त पर पदपद्य के महावीर, यथुपति अन्य जो, यथास्थान हो निर्निमेष देखते राम को जितसरोजमुख श्याम देश।

निराला ने राम को उनकी परंपरागत दिव्यता के महाकाश से उतार कर एक साधारण मानव के धरातल पर खड़ा कर दिया है, जो थकता भी है, टूटता भी है और जिसके मन में जय एवं पराजय का भीषण द्वन्द्व भी चलता है। वानरी सेना की जो दशा है, वह तो है ही, स्वयं राम की स्थिति दयनीय है। वे एक ऐसे विशाल पर्वत की भांति हैं, जिनपर छितराए हुए केश जाल के रूप में रात्रि का सघन अंधकार छाया हुआ है और प्रतीक योजना से यह अंधकार उस पराजय-संकट को भी रूपायित करता है, जो राम के हृदय में किसी प्रचंड झंझावात की भांति उमड़ रहा है और तारक रूपी आशा की किरणें वहां से बहुत दूर नीले आकाश से आ रही है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार। ऐसे क्षण अन्धकार घन में जैसे विद्युत जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन विदेह का, प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन नयनों का नयनों से गोपन प्रिय सम्भाषण पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान पतन, काँपते हुए किसलय, झरते पराग समुदय, गाते खग नवजीवन परिचय, तरू मलय वलय, ज्योतिः प्रपात स्वर्गीय, ज्ञात छवि प्रथम स्वीय, जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय।

ऐसी क्षण घन में जैसे विद्युत…….. जानकी नयन कंपनी है प्रथम कंपनी तु

इन पंक्तियों में कवि वर्तमान परिदृश्य के वर्णन में बार-बार अतीत की ओर लौट रहे हैं अपने अतीत के दृश्य का चिंतन कर राम पुनः पुनः वर्तमान में आते हैं और आज के हुए रण के बारे में विचार करते हैं

सिहरा तन, क्षण भर भूला मन, लहरा समस्त, हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त, फूटी स्मिति सीता ध्यानलीन राम के अधर, फिर विश्व विजय भावना हृदय में आयी भर, वे आये याद दिव्य शर अगणित मन्त्रपूत, फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत, देखते राम, जल रहे शलभ ज्यों रजनीचर, ताड़का, सुबाहु बिराध, शिरस्त्रय, दूषण, खर, सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान, नल–नील, गवाक्ष सभी उपस्थित हैं। लक्ष्मण राम के पीछे हैं। हनुमान कर-पद प्रक्षालन के लिए जल लेकर उपस्थित हैं। सेना को विश्राम का आदेश दे दिया गया है। निराला यहाँ फिर प्रतीकों का सहारा लेते हैं और आसन्न पराजय-संकट का एक डरावना चित्र उभरता है –


र देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को, ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण, पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन,

फिर देखी भीमा मूर्ति ….. ‌‌ पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन

आज रण में जो कुछ भी दिखा है उससे न्याय ही ज्योति छिन्न होती दिखी जहां राम सत्य के लिए लड़ रहे हैं फिर भी वह निर्बल साबित हो रहे हैं रावण के सामने जो अधर्म को धारण किए हुए हैं फिर भी शक्ति उसी के पक्ष में दिख रही है

लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन, खिच गये दृगों में सीता के राममय नयन, फिर सुना हँस रहा अट्टहास रावण खलखल, भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्तादल। बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल। ये नहीं चरण राम के, बने श्यामा के शुभ, सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभ, टूटा वह तार ध्यान का, स्थिर मन हुआ विकल सन्दिग्ध भाव की उठी दृष्टि, देखा अविकल बैठे वे वहीं कमल लोचन, पर सजल नयन, व्याकुल, व्याकुल कुछ चिर प्रफुल्ल मुख निश्चेतन। "ये अश्रु राम के" आते ही मन में विचार, उद्वेल हो उठा शक्ति खेल सागर अपार, हो श्वसित पवन उनचास पिता पक्ष से तुमुल एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़, जलराशि राशिजल पर चढ़ता खाता पछाड़, तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष, शत वायु वेगबल, डूबा अतल में देश भाव, जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश पहुँचा, एकादश रूद क्षुब्ध कर अट्टहास। रावण महिमा श्यामा विभावरी, अन्धकार, यह रूद्र राम पूजन प्रताप तेजः प्रसार, इस ओर शक्ति शिव की दशस्कन्धपूजित, उस ओर रूद्रवन्दन जो रघुनन्दन कूजित, करने को ग्रस्त समस्त व्योम कपि बढ़ा अटल, लख महानाश शिव अचल, हुए क्षण भर चंचल, श्यामा के पद तल भार धरण हर मन्दस्वर बोले "सम्वरो, देवि, निज तेज, नहीं वानर यह, नहीं हुआ श्रृंगार युग्मगत, महावीर। अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय शरीर, चिर ब्रह्मचर्यरत ये एकादश रूद्र, धन्य, मर्यादा पुरूषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य लीलासहचर, दिव्य्भावधर, इन पर प्रहार करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार, विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोध, झुक जायेगा कपि, निश्चय होगा दूर रोध।" कह हुए मौन शिव, पतन तनय में भर विस्मय सहसा नभ से अंजनारूप का हुआ उदय। बोली माता "तुमने रवि को जब लिया निगल तब नहीं बोध था तुम्हें, रहे बालक केवल, यह वही भाव कर रहा तुम्हें व्याकुल रह रह। यह लज्जा की है बात कि माँ रहती सह सह। यह महाकाश, है जहाँ वास शिव का निर्मल, पूजते जिन्हें श्रीराम उसे ग्रसने को चल क्या नहीं कर रहे तुम अनर्थ? सोचो मन में, क्या दी आज्ञा ऐसी कुछ श्री रधुनन्दन ने? तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य, क्या असम्भाव्य हो यह राघव के लिये धार्य?" कपि हुए नम्र, क्षण में माता छवि हुई लीन, उतरे धीरे धीरे गह प्रभुपद हुए दीन। राम का विषण्णानन देखते हुए कुछ क्षण, "हे सखा" विभीषण बोले "आज प्रसन्न वदन वह नहीं देखकर जिसे समग्र वीर वानर भल्लुक विगत-श्रम हो पाते जीवन निर्जर, रघुवीर, तीर सब वही तूण में है रक्षित, है वही वक्ष, रणकुशल हस्त, बल वही अमित, हैं वही सुमित्रानन्दन मेघनादजित् रण, हैं वही भल्लपति, वानरेन्द्र सुग्रीव प्रमन, ताराकुमार भी वही महाबल श्वेत धीर, अप्रतिभट वही एक अर्बुद सम महावीर हैं वही दक्ष सेनानायक है वही समर, फिर कैसे असमय हुआ उदय यह भाव प्रहर। रघुकुलगौरव लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण, तुम फेर रहे हो पीठ, हो रहा हो जब जय रण। कितना श्रम हुआ व्यर्थ, आया जब मिलनसमय, तुम खींच रहे हो हस्त जानकी से निर्दय! रावण? रावण लम्प्ट, खल कल्म्ष गताचार, जिसने हित कहते किया मुझे पादप्रहार, बैठा उपवन में देगा दुख सीता को फिर, कहता रण की जयकथा पारिषददल से घिर, सुनता वसन्त में उपवन में कलकूजित्पिक मैं बना किन्तु लंकापति, धिक राघव, धिक धिक? सब सभा रही निस्तब्ध राम के स्तिमित नयन छोड़ते हुए शीतल प्रकाश देखते विमन, जैसे ओजस्वी शब्दों का जो था प्रभाव उससे न इन्हें कुछ चाव, न कोई दुराव, ज्यों हों वे शब्दमात्र मैत्री की समानुरक्ति, पर जहाँ गहन भाव के ग्रहण की नहीं शक्ति। कुछ क्षण तक रहकर मौन सहज निज कोमल स्वर, बोले रघुमणि "मित्रवर, विजय होगी न, समर यह नहीं रहा नर वानर का राक्षस से रण, उतरी पा महाशक्ति रावण से आमन्त्रण, अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति।" कहते छल छल हो गये नयन, कुछ बूँद पुनः ढलके दृगजल, रुक गया कण्ठ, चमक लक्ष्मण तेजः प्रचण्ड धँस गया धरा में कपि गह युगपद, मसक दण्ड स्थिर जाम्बवान, समझते हुए ज्यों सकल भाव, व्याकुल सुग्रीव, हुआ उर में ज्यों विषम घाव, निश्चित सा करते हुए विभीषण कार्यक्रम मौन में रहा यों स्पन्दित वातावरण विषम। निज सहज रूप में संयत हो जानकीप्राण बोले "आया न समझ में यह दैवी विधान। रावण, अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर, यह रहा, शक्ति का खेल समर, शंकर, शंकर! करता मैं योजित बार बार शरनिकर निशित, हो सकती जिनसे यह संसृति सम्पूर्ण विजित, जो तेजः पुंज, सृष्टि की रक्षा का विचार, हैं जिनमें निहित पतन घातक संस्कृति अपार। शत शुद्धिबोध, सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, जिनमें है क्षात्रधर्म का धृत पूर्णाभिषेक, जो हुए प्रजापतियों से संयम से रक्षित, वे शर हो गये आज रण में श्रीहत, खण्डित!

(देखा है महाशक्ति रावण को लिये अंक, लांछन को ले जैसे श