टीसता जख्म

अचानक से उमा की आंँख खुल जाती है। ऊपर छत की तरफ देखती हुई वह गहरी सांस लेती है। आहिस्ता से उठती है। सिरहाने रखा पानी के बोतल से कुछ घूंट अपने सूखे गले में डालती है।आंखें बंद कर वह पानी को ऐसे गले से नीचे उतरती है जैसे वह उन सब बातों को अपने अंदर पचा लेना चाहती है..... पर यह हो नहीं पा रहा। हर बार वह दिन उबकाई की तरह उसके पेट से निकल कर उसके मुंह में भर आता है। जिसकी दुर्गंध से उसकी सारी ज्ञानेंद्रियाँ कांप उठतीं हैं। पानी अपने हलक से नीचे उतारकर वह अपना मोबाइल देखती है....


रात के डेढ बजे हैं। वह तकिए को बिस्तर के ऊंचे उठे सिराहने से टिका कर उस पर सिर रख पड़ जाती है। अभी भी उसकी नजर छत पर गड़ी है। सफेद रंग की छत जैसे सिनेमा का पर्दा बन गया हो और उस पर वह सपना फिर से तैर जाता है...... जिसे देखते हुए वह जागी है। वह अपनी आंखे बंद कर लेती है। आखिर क्यों यह सपना आया? वह सपने को दुबारा सोचने लगती है।

एक चंदन का सुखा वृक्ष खड़ा है.... उसके आसपास मध्यम सी रोशनी है। मोटे तने से होते हुए दो सूखी शाखाएं ऊपर की ओर जा रही हैं.... जैसे कि कोई दोनों हाथ ऊपर उठाए खड़ा हो। बीच में एक शाखा चेहरे सा उठा हुआ है और तना तन लग रहा है। धीरे-धीरे वह सुखा चंदन का पेड़ साफ दिखने लगता है। रोशनी उस पर तेज हो गई है। बहुत करीब है अब......यह एक स्त्री की आकृति है। यह बहुत ही सुंदर किसी अप्सरा सी नर्तकी से भाव-भंगिमाएं नाक, आंख, होंठ, गर्दन, कमर की लचक, लहराते सुंदर बाजू सब साफ दिख रहे हैं। चंदन की खुशबू से वहां स्वर्ग सा माहौल बन रहा है..... कि तभी उस सूखे पेड़ पर उस उकेरी हुई अप्सरा पर एक विशाल सांप लिपटा हुआ दिखने लगता है। बेहद विशाल गहरा चमकीला नीला, हरा, काला रंग उसके ऊपर चमक रहा है। सारे रंग किसी लहर की तरह लहरा रहे हैं। आंखों के चारों ओर सफेद चमकीला रंग है। और सफेद चमकीले उस रंग से घिरा उस का गोल आँख उस अप्सरा की पूरी काया को अपने में समा लेने की हवस लिए हुये है। रक्त से लाल.... किसी कौंधती बिजली से कटे उसके जीव उस काया पर लपलपा रहे हैं। वह विशाल सांप अपनी जकड़ को घूम-घूमकर इतना ज्यादा कस रहा है कि वह उस पेड़ को मसलकर धूल ही बना देना चाह रहा हो। तभी वह काया जीवित हो जाती है। सांप उससे दूर गिर पड़ता है। वह एक सुंदर सी अप्सरा बन खड़ी हो जाती है और सांप की तरफ अपनी दृष्टि में ठहराव, शांति, आत्मविश्वास और आत्मशक्ति से ज्यों ही नजर डालती है वह साँप गायब हो जाता है.... और बस उमा जाग जाती है सपने को दोबारा सोचकर उमा पुनः बोतल से पानी की दो घूंट अपने हलक से उतारती है। अब उसे नींद नहीं आ रही। भारतीय वन सेवा की बडे ओहदे पर है उमा। उमा को मिला यह बड़ा सा घर और रहने के लिए वह अकेली..... तीन तो सोने के हीं कमरे हैं। जो लगभग बंद ही रहते हैं। एक में वह सोती है। उमा उठकर बाहर के कमरे में आ जाती है.... और बड़ी सी पूरे शीशे की खिडकी पर से पर्दा सरकार देती है। दूर दूर तक अंधेरा...आई. जी. एन. एफ. ए. देहरादून के आहाते में पडों की पंक्तियों के नीचे से उपर की ओर रौशनी करते ब्लब से बाहर दृश्य धुंधला सा दिख रहा था। अभी-अभी बारिश रुकी थी। चिनार के ढलाव से नुकीले पत्तों पर लटकते बूंद पर नजर गड़ाए वह उस बीते एक दिन में चली जाती है।


उन दिनों वह अपनी पी.एचडी के अध्ययन के सिलसिले में अपने शहर राँची के बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (कांके) आई हुई थी। पूरा बचपन तो यहीं बीता उसका। झारखंड के जंगलों में अवैध खनन व अवैध जंगल के पेड़ काटने पर रोक व अध्ययन के लिए जिला स्तर की कमीटी थी। आज उमा ने उस कमेटी के लोगों को बातचीत के लिए बुलाया था। उसे जरा भी पता नहीं था, उसके जीवन में कौन सा सवाल उठ खड़ा होने वाला है।

मीटिंग खत्म हुई.... सारे लोग चाय के लिए उठ गए...उमा अपने लैपटॉप पर जरूरी टिप्पणियों को लिख लेने में लग गयी। तभी उसे लगा कोई उसके पास खड़ा है। उसने नज़र ऊपर कि..... एक नजर उसके चेहरे पर गडीं हुई थीं..... अनवर-आपने मुझे पहचाना नहीं?

उमा - सॉरी नहीं पहचान रही।

अनवर-हम स्कूल में साथ थें।

उमा - क्षमा करें मेरी याददाश्त कमजोर हो गई है। स्कूल की बातें याद नहीं है।

अनवर-मैं अनवर हूं। याद आ रहा है? अनवर नाम तो सुना - सुना लग रहा होगा एक लड़का था दुबला पतला शैतान सा। शैतान नहीं था मैं बेहद चंचल था।

उमा गौर से देखती है। कुछ याद करने की कोशिश करती है.... और अनवर स्कूल के अन्य दोस्तों के नाम व कई घटनायें बोलता जाता है। उमा को लगा जैसे कहीं खोया उसका बचपन झांकने लगा है। पता नहीं कब वह अनवर के साथ सहज हो गयी हँसने लगी स्कूल की यादों में डूबने लगी।

अनवर - मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाया। मैं साइलेंट लवर हूँ तुम्हारा।मैं तुमसे अब भी बेहद प्यार करता हूँ।

उमा - ये क्या बकवास है? पागल हो गये हो क्या? स्कूल में हीं रूक गये हो क्या?

अनवर-हाँ कहो पागल मुझे। मैं उस समय तुम्हें अपने प्यार के बारे में न कह सका.... पर आज मैं फिर इस नसीब से मिले मौके को गंवाना नहीं चाहता। आइ लव यु उमा। तुम पहले भी सुन्दर थी अब बला की खुबसूरत हो गयी हो।

उमा झट वहां से उठ जाती है और अपनी गाडी से अपने आवास की ओर निकल लेती है। आइ लव यु उसके कानों में मस्तिष्क में रह रह कर गूंज रहे थे। कभी ये एहसास अच्छा लगता तो कभी वह इसे परे झटक देती।

फोन की घंटी से उसकी नींद खुलती है। अनवर का फोन है। वह उस पर ध्यान नहीं देती.. फिर घड़ी की तरफ देखती है सुबह के छःबज गए हैं। इतनी सुबह अनवर ने रिंग किया? उमा उठ कर बैठ जाती है। चेहरा धोकर चाय बनाती है। अपने फोन पर जरूरी मैसेज कॉल ईमेल देखने में लग जाती है। तभी फिर फोन की घंटी बज उठती है। फिर अनवर का फोन है।

अनवर-हेलो। हाँ, हेलो उठ गई क्या? गुड मॉर्निंग।

उमा - इतनी सवेरे रिंग कर दिया?

अनवर-हाँ। क्या करूं रात को मुझे नींद ही नहीं आई।तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा।

उमा-मुझे अभी बहुत काम है। बाद में बात करती हूँ।

और फोन काट देती है।

आधे घंटे में फिर अनवर का फोन...

अनवर - अरे मैं तुमसे मिलना चाहता हूं।

उमा - नहीं नहीं मुझे नहीं मिलना है। मुझे बहुत काम है और वह फोन जल्दी से रख देती है।

आधे घंटे बाद फिर अनवर का फोन...

अनवर -सुनो फोन काटना मत। बस एक बार मिलना चाहता हूँ फिर मैं कभी नहीं मिलूंगा।

उमा - ठीक है लंच के बाद आ जाओ।

लंच के समय कमरे की घंटी बज उठती है। उमा दरवाजा खोलती है। सामने अनवर खड़ा था। अनवर बेखौफ दरवाजे के अंदर चला जाता है।

अनवर- माशा अल्लाह बला की खुबसूरत लग रही हो। मेरे इंतजार में थी न? हम्म तुमने खास अपने आप को मेरे लिए तैयार किया है न?

उमा- ऐसी कोई बात नहीं। मैं अपने सबसे साधारण लिबास में हूँ। मैंने कुछ भी खास नहीं किया है।

अंदर लगी कुर्सी पर अनवर ढ़ीठ की तरह बैठ जाता है। उमा के अंदर बेहद हलचल मची हुई है पर वह अपने आप को सहज रखने की भरपूर कोशिश में है। वह भी दूसरे कोने में पड़ी कुर्सी पर बैठ जाती है। अनवर दो बार राष्ट्रीय स्तर की मुख्य राजनीतिक पार्टी से चुनाव के लिए खड़ा हो चुका था। लेकिन वह दोनों बार चुनाव हार गया था। अब वह अपने नेता होने व दिल्ली तक पहुंच होने को छोटे मोटे कार्यों के लिए भुनाता है। कई ठेके के काम हैं अब उसके। बात चीत व हुलिया देख कर लग रहा था कि वह अमीरी की जिंदगी काट रहा है। अनवर की पूरी शख्सियत से उमा डरी हुई थी।

अनवर - मैं तुमसे बहुत सी बातें करना चाहता हूं। मैं तुमसे अपने दिल की सारी बात बताना चाहता हूं। आओ न थोड़ा करीब तो बैठो। प्लीज।

अनवर अपनी कुर्सी उसके करीब सरका लेता है।

अनवर- तुम भरपूर औरत हो।

अचानक जैसे उमा का बदन सिहर उठा। अनवर ने उसका हाथ दबा लिया था। अनवर की आंखें गिद्ध की तरह उमा के चेहरे को टटोलने की कोशिश में लगी थी। उमा अपना हाथ खींच लेती है।

उमा - मैं चाय बना कर लाती हूं।

अनवर - नही नहीं तुम यहीं बैठो न।

उमा थोडी हीं दूर पर रखे बिजली की केतली में चाय तैयार करने लगती है। तभी उमा को अपने गले पर गर्म सांसों का एहसास होता है। उमा थोड़ी दूर जाकर खड़ी हो जाती है।

अनवर - क्या हुआ? तुमने शादी नहीं की पर तुम्हे चाहत तो होती होगी न।

उमा - कैसी बकवास लगा रखी है तुमने।

अनवर-क्यों हम कोई बच्चे थोड़ी हैं अब। बकवास तो तुम कर रही हो।

अनवर के होंठ उमा के अंगों को छूने लगते हैं। उमा फिर दूर चली जाती है।

उमा - अनवर बहुत हुआ बस करो। मुझे ये पसंद नहीं।

अनवर - एक मौका दो। क्या हो गया तुम्हें अच्छा नहीं लगा क्या? तुम से प्यार करता हूं। सुनो तो। तुम खुलकर मेरे साथ आओ तो।

और उमा को गोद में उठा लेता है। पता नहीं उस एक पल में किस तिलिस्म में उमा फंस जाती है। अपने आप को वह फूलों सा हलका महसूस करती है। अनवर की गोद में कुछ पल उसकी आँखें बन्द हो जातीं हैं। अनवर नें उसे बिस्तर पर लिटा दिया था और अपने आप को उस पर हावी करने की कोशिश की तभी बिजली के झटके सी उमा छिटक के दूर खडी हो जाती है।

उमा - अभी.. अभी निकलो.. यहां से.... ।

अनवर हारे हुये शिकारी सा उसे देखता रह जाता है।

उमा- मैं कह रही हूं... तुम जाओ यहां से.... ।

अनवर कुछ नहीं बोलता।

उमा - मैं किसी तरह का हंगामा हल्ला नहीं करना चाहती। तुम बस यहां से चले जाओ।

अनवर अपना रुमाल निकालता है.... अपने चेहरे पर आए पसीने को पोंछता है और बिना कुछ कहे वहां से निकल जाता है। उमा दरवाजा बंद कर डर से काँप उठती है। सारे आँसू गले में अटक के रह जातें हैं।अपने अंदर छुपी इस कमजोरी को उसने पहली बार इस तरह से सामने आते देखा है। बहुत मुश्किल से उस रात नींद आती है।

फोन की घंटी से उसकी निंद खुलती है।

अनवर - मै बहुत बेचैन हूँ। मुझे माफ़ कर दो।

उमा फोन काट देती है, और उसका नंबर ब्लॉक कर देती है। फिर एक अनजान नंबर से फोन आता है। अनवर की आवाज है।

अनवर - मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारी दोस्ती नहीं खोना चाहता। उमा फोन को काट देती है। यह फोन नंबर भी ब्लॉक कर देती है। वह बहुत डर गई है। उसके वापस जाने में दो दिन और हैं। एक दिन पूरा बीत जाता है। कोई फोन नहीं आता। किसी तरह रात कटती है। आज तो जाना हीं है। एक - एक पल भारी लग रहा है। उमा अपने सारे काम जितनी जल्दी हो सके कर लेती है और पाँच घंटे पहले हीं एयरपोर्ट चल देती। यहां पहुंच कर उसे राहत मिलती है। आह! बच गयी।

कई महिने हो गये। वो अपने आप में अपने कामों में इतनी व्यस्त रही कि एक बार भी उसे कुछ याद नहीं आया। हलकी याद भी आई तो यही कि वह जंग जीत गयी है।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग


चंदन विष व्याप्त नहीं, लपटे रहत भुजंग

अचानक एक दिन एक फोन आया। उस तरफ अनवर था।

अनवर - सुनो। मेरा फोन न काटना। ना ब्लॉक करना। मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पा रहा। बताओ ना तुम कहां हो। मैं तुमसे मिलना चाहता हूं। मैं मर रहा हूँ। मुझे बचा लो।

उमा - यह किस तरह का पागलपन है। मैं तुमसे बात नहीं करना चाहती। न मैं तुमसे मिलना हीं चाहती हूँ।

अनवर-अरे जाने दो। भाव दिखा रही है। अकेली औरत। शादी क्यों ना किया। मुझे नहीं पता क्या? नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को। मजे ले लेकर अब मेरे सामने सती सावित्री बनती हो। तुम्हें क्या चाहिए मैं सब देने को तैयार हूं।

ऐसा लगा जैसे किसी ने खौलता लावा उमा के कानों में उड़ेल दिया हो। उसने फोन बंद करके रख दिया इस नंबर को भी ब्लॉक कर दिया।यह परिणाम उस बस एक पल का जब वह पहली बार में हीं कडा कदम न उठा सकी थी। इस बात को बीते चार साल हो गये हैं। अनवर का फोन फिर कभी न आया। उमा ने अपना नम्बर बदल लिया था। पर आज ये सपना......कहीं न कहीं घाव रिसता है ..दर्द होती हैं। कहतें हैं समय हर घाव भर देता है पर उमा देख रही है की आत्मा पर लगे जख्म रह- रह कर टिस्ते हैं।

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