• rashmi kiran

दोस्त या दुश्मन

Updated: Jun 1

सुबह सुबह की सैर पर निकलना लगभग मेरा रोज़ का हीं काम है। जिस रास्ते मैं निकलती हूँ उस रास्ते के बीच में ही मैं हमेशा तुम्हें देखती वैसे ही बैठे हुए जैसे कोई तपस्वी किसी देवी के आने का इंतजार कर रहा हो आँखे बाहर की गाड़ियों से भरे रोड पर चौकसी से नजर रखे हुए। तुम क्या सोचते हो क्या देखते हो किसका इंतजार है जैसे कई सवाल लिए हुए मैंने आज रूक कर तुमसे पूछ ही लिया। हाँ तुम एक स्वान हो। पर हम इंसानों से तुम्हारी दोस्ती इतनी लंबी है कि अब हम बिना शब्दों के ही भाषा समझ सकते हैं।

उसने कहा मैं उससे बेहद प्रेम करता हूँ हमारे बच्चे हुए 3 बच्चे। यहां घनी झाड़ियां थीं। यहीं जहाँ तुम खडी हो। आज जिसे

तुम अपना घर कहती हो। पेड़ पौधे थे यहाँ। यह हमारा घर था। हम बड़े चैन से यहां खुश हाल रह रहे थे। हमारा प्रेम बहुत अलग सा था। ना वह मुझे छोड़ पाती थी ना मैं उसके बिना एक कदम चल सकता था। वह देख रही हो भोला है। मैं ने देखा वहाँ। उसका रंग भी काला था। उसकी काया बडी़ दुबली पतली थी। और बे चैन सी बडी उदासी ली हुई उसकी आँखें बेतहाशा पता नहीं क्या ढूंढ रहीं थीं । चारों ओर सीमेंट व कंक्रीट से जमीन ढकी थी। मिट्टी के तो दर्शन हीं नहीं थे। इतने में उसने आगे कहा भोला है कि अभी भी देखो कैसे जमीन में दबा कर रखी गई अपने पसंद के खाने को ढूंढ रहा है और हल्की सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर आ जाती है। इसकी इस आदत का हम कितना मज़ाक बनाते थे।

वह आगे कहता है और भोलू को कितना परेशान करते थे उसे सताते थे यह किसी से भी कहीं से भी मिले अच्छे खाने को पहले जमीन में गाड़ देता था और फिर थोड़ा थोड़ा निकाल कर खाता था हम खाना चुरा लिया करते थे बेचारा देखो देख रही हो जिस तरह से जमीन को सूंघ रहा है वैसे ही पहले तो सूंघता  फिरता था जब हमें हंसता देखता तो उसे पता चलता था कि गड़बड़ हो चुकी है आओ तुम्हें कुछ और दिखाऊँ। यह दबी हुई मिट्टी देख रही हो कल ही दबा दी गई है। मैं ने देखा दो तीन बडे़ पुराने दरख्त थे। उन्हे चारों ओर से घेर कर छोटे पार्क की शक्ल दी गई थी।उस पार्क के चारों ओर की ज़मीन तो कंक्रीट की कर दी गयी थी पर उस घेरे में अब भी मिट्टी पुरानी अवस्था में ही थी।

बेहद उदास व गंभीर आवाज में वह अपनी नफरत को काबू करता हुआ कहता है - जॉनी नहीं रहा। वह अंदर ही था। जब लोग इस सुरंग को मिट्टी से पाट रहे थे। "सुरंग" मैं चौंकी ध्यान से देखा तो वहाँ ताजी कोडी गयी मिट्टी दिखी। पर वहाँ सुरंग का रास्ता था ये पता नहीं चल पा रहा था। उसने आगे कहा। जब यहां बड़ी बड़ी इमारतों को बनाने का सिलसिला शुरू हुआ था तभी से जॉनी जो बेहद तेज दिमाग का था ने कहा मैं यहां से बाहर निकलने का और अंदर आने का एक रास्ता बनाऊंगा जमीन में सुरंग बनाऊंगा मैं अपने इस घर की यादों से दूर नहीं हो सकता मैं तो यही आना जाना करता रहूंगा पर यह बड़े बड़े लोहे के गेट यह उँची चारदीवारी मुझे रोक ना ना सकेंगे और सुरंग बना ही लिया था उसने। पर आज लोगों की नजर पड़ गई सुरंग के साथ जॉनी भी गया। तुम्हें पता है रात दिन एक कर दी थी उसने सुरंग बनाने में। हम में से कोई न कोई उसके लिए खाना ले आता था। हल्के हंसते हुये वह उन बीती मीठी याद में ज़रा खोते हुये कहता हे। ये जो खाना छुपाता न भोलू उसने भी कई दिन अपना खाना जॉनी को खिला आया था।

मैं स्तब्ध सब सुन रही थी तभी दुनिया उनकी नजरों से नहीं देखा ना जानने की कोशिश की पर आज मन कितने ही विचारों से भर गया मैंने बात आगे बढ़ाई पर आप तो बताओ कुछ। क्या बताऊं बोलो मुझे बीच में हीं रोकता वह अनमने से कुछ भूलने का कुछ न समझ पाने जैसा व्यवहार करता मुँह फेर आगे बढता हुआ कहता है। तुम्हारे सवाल मैं जानता हूं। पर मैं तुम्हें जवाब नहीं देना चाहता। मैं जिस सोच जिस आस में लगातार यहां बैठा हूं वह मेरे जवाब देते ही क्षण में टूट जाएगा। मुझे इंतजार है सोहा आएगी। अपने बच्चों को घूमने हीं तो ले गई है। कहा था रात में गाड़ियाँ कम रहती हैं बाहर घुमा लाती हूं बच्चों को पर..कहता कहता वह रुकता है अपनी आँखों को भींच लेता है

सत्य असत्य से लडता और आशा निराशा के भंवर को पार करता वह एक तूफान अपने अंदर जज्ब करता पर शान्त प्रलय सा मुझे प्रतीत हुआ। वह धीरे से बुदबुदा कर कहता है अब तक नहीं लौटी है लौट ही रही होगी जाऊँ मैं। तुम जाओ अपनी शैर पर मैं यही बैठता हूं कहीं सोहा आ गई और मुझे ना देखा तो परेशान हो उठेगी। और मैं उस तपस्वी को पुनः उसी अवस्था में चौकस बैठा रोड की ओर निहारता देखती रह गई और आगे निकल गई मानव सभ्यता या असभ्यता? पर एक कदम और आगे कितनी सभ्यता को नाश करता चलेगा पता नहीं?

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