• admin@sahityakiran

“Om gam ganapataye namaha,"

Updated: Aug 27

“Om gam ganapataye namaha,”

“om gam ganapataye namaha”

१)ॐ श्री गणेशाय नम:

२)ॐ श्री गणेशाय नम:

३)ॐ श्री गणेशाय नम:

४)ॐ श्री गणेशाय नम:

५)ॐ श्री गणेशाय नम:

६)ॐ श्री गणेशाय नम:

७)ॐ श्री गणेशाय नम:

ॐ श्री गणेशाय नम:

८)ॐ श्री गणेशाय नम:

९)ॐ श्री गणेशाय नम:

१०)ॐ श्री गणेशाय नम:

११)ॐ श्री गणेशाय नम:

श्रीगणेश

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार की बात है जब देवी पार्वती कैलाश पर्वत पर जहां वह रहती थी वहां उन्होंने अपने स्नान की तैयारी की उस समय वह किसी भी प्रकार विघ्न नहीं चाहती थी उन्होंने श्री नंदी से कहा जो कि उनके पति भगवान शिव के सवारी बैल है कि वह दरवाजे पर रहे और किसी को भी अंदर आने ना दें नंदी ने बहुत ही विश्वास के साथ वहां पहरा देना शुरू किया और कोशिश की कि देवी की इच्छा की पूर्ति हो तू जब भगवान शिव वहां आए और वह अंदर जाने लगे तो नंदी ने उन्हें तनिक भी नहीं रोका क्योंकि वह भगवान शिव के बड़े सेवक थे इससे देवी पार्वती क्रोधित हो गई उन्हें इस बात से ज्यादा क्रोध आया कि उनके पति के समान उनका आज्ञाकारी सेवक कोई भी नहीं है ऐसा विचार आते ही उन्होंने अपने शरीर पर लगे हुए हल्दी के उत्तर से गणेश भगवान का निर्माण किया और उन्हें अपना बेटा घोषित किया

अगली बार जब देवी पार्वती को नहाने की इच्छा हुई तो उन्होंने भगवान गणेश को पहरेदार नियुक्त किया उसी समय भगवान शिव वहां आए और एक अजनबी लड़के को देखकर आश्चर्यचकित रह गए जो उन्हें अपने ही घर में प्रवेश करने नहीं दे रहा है भगवान शिव को अत्यंत क्रोध हो आया और उन्होंने गणेश भगवान पर आक्रमण कर दिया भगवान गणेश देवी पार्वती के पुत्र थे इसीलिए वह भी हार नहीं माने

.यह देखकर भगवान शिव को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह असाधारण बालक कौन है शिव वैसे तो बड़े शांतिप्रिय हैं फिर भी उन्होंने उस बालक से युद्ध किया युद्ध करते हुए अत्यंत क्रोध में भरकर उन्होंने उस बालक का सर धड़ से अलग कर दिया देवी पार्वती को जब यह ज्ञात हुआ तब वे अत्यंत अपमानित महसूस करती हुई क्रोध में भरकर पूरी सृष्टि को नाश कर देने की ठान ली ब्रह्मा जी को जब यह पता चला कि उनकी बनाई सृष्टि को भी विनाश कर देंगे तो वह देवी से प्रार्थना करने लगे कि वह ऐसा ना करें भगवान शिव को जब पता चला तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि आखिर यह बालक कौन था जिसके कारण देवी इतना ज्यादा क्रोधित हो गई है सभी देवता देवी से क्षमा प्रार्थना करने लगे देवी ने कहा कि मेरा क्रोध तभी शांत होगा जब मेरा बेटा वापस जीवित हो जाएगा और उसकी पूजा सभी देवताओं से पहले की जाएगी

शिव का गुस्सा शांत हुआ और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने पार्वती की शर्त मान ली और उन्होंने ब्रह्मा जी से आग्रह किया कि वे एक ऐसे जीव का सर लेकर आए जिन पर उनकी पहली नजर पड़े और वह अपना सिर उत्तर की ओर करके सोया हुआ है ब्रह्मा जी अति शीघ्र एक बहुत ही शक्तिशाली और ताकतवर हाथी का सिर लेकर लौटे वह सिर भगवान शिव ने भगवान गणेश के शरीर पर लगाया उन्होंने भगवान गणेश की शरीर में प्राण वापस दिया और उन्हें अपना पुत्र घोषित किया देवी के कहे अनुसार उन्होंने गणेश को सर्वप्रथम पूजनीय होने का आशीर्वाद दिया और अपने सभी गणों का गणपति घोषित किया

आध्यात्मिक तौर पर इस कथा का अर्थ बड़ा ही व्यापक है

देवी पार्वती आदिशक्ति पूरे ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी है योग विद्या में ऐसा कहा गया है कि मानव शरीर में मूलाधार चक्र में कुंडलिनी शक्ति के रूप में देवी स्थापित होती है जब हम अपने ऊर्जा की शुद्धि करते हैं तब हमें सत्य शिव और सुंदर के दर्शन होते हैं इसीलिए जब देवी स्नान को जाती है तो शिव स्वयं वहां प्रकट हो जाते हैं

नंदी जो भगवान शिव की बैल है पार्वती ने उन्हें पहले द्वारपाल नियुक्त किया था परंतु नंदी के भक्ति बस एक ही तरफ थी वह था शिव की भक्ति इसीलिए उन्होंने शिव को अंदर प्रवेश करने दिया अपने आदेश करता के प्रति वे अपना कर्तव्य दिखाने से चूक गए क्योंकि वह आध्यात्मिक की ऊंचाई को प्राप्त करने से रह गए थे और यह तभी प्राप्त हो सकती है जब आदिशक्ति देवी की कृपा आप पर हो.

पार्वती ने गणेश का निर्माण किया जो यह बताता है कि जब ज्ञान की गहराई से जुड़ते हैं तब हल्दी की तरह पीले रंग का मूलाधार चक्र में स्थित कुंडलिनी में आदिशक्ति का आभास होता है तब हमें ब्रह्म के परम रहस्य का ज्ञान पूरी तरीके से खुले दिमाग से ही हो सकता है ब्रह्म ब्रह्मांड और मोह माया संसार का वास्तविक ज्ञान हम तभी पा सकते हैं और यही है भगवान गणेश की कृपा

भगवान शिव जो देवों के देव हैं और परम गुरु हैं उनके सामने भगवान गणेश अहंकार के रूप में प्रकट होते हैं उस अहंकार के वशीभूत शिव भी गणेश की सच्चाई नहीं समझ पाते हैं वे अहंकार के साथ बस में उलझते हैं और अपनी पूरी सेना लगा देते हैं उससे लड़ने के लिए उनके सारे गणों को गणेश से हारना पड़ता है और अंत में उस अहंकार का नाश को ही उसे मृत करके करना पड़ता है वह उनका सर काट देते हैं इस प्रकार ज्ञान अज्ञान रूपी अहंकार से जीत हासिल कर लेता है

अहंकार का नाश होता है तू जीव अपनी आत्मा को पहचान पाता है और वह मुक्ति की ओर अग्रसर होता है वह सारे भौतिक कारणों के बंधनों से मुक्त होने लगता है और वह परम ब्रह्म की ओर अग्रसर हो जाता है गणेश की मृत्यु का समाचार पाते हैं दीदी ने भी इस भौतिक ब्रह्म का नाश करने का सोच लिया यह भौतिक और अभौतिक परम ब्रह्म तो देवी स्वयं है यह पूरा चराचर जगत तो देवी में ही व्याप्त है और अचलायमान देवाधिदेव तो भगवान शिव है शिव ब्रह्मांड की आत्मा है इस ब्रह्मांड के रहस्य क्यों जानने समझने के लिए अपने अहंकार का त्याग कर हर भौतिक बंधन से खुद को मुक्त कर गणेश की कृपा प्राप्तक् करना पड़ता है

भगवान शिव ने भगवान गणेश के धड़ पर गज का स्थापित किया यह बताता है कि हमें इस सांसारिक छोटी-छोटी अहंकारों से ऊपर उठकर ब्रह्म के अहम को समझना चाहिए हमें अपने दैहिक बुद्धि से ऊपर उठकर परम विस्तृत ब्रह्मा को अपनी बुद्धि में स्थान देना चाहिए और जब हमारी बुद्धि का विस्तार होता है तो हमें एक नई जिंदगी मिलती है जोकि सत्य की ओर अग्रसर होती है तब हम अपने दैहिक अहंकार से ऊपर उठ जाते हैं और इस संसार के परम ज्ञान से परिचित होते हैं

भगवान गणेश को शिवनी सभी गणों का नायक बनाया साधारण भाषा में अगर हम समझे तो गढ़ का अर्थ हर तरह के कीट पतंगे जानवर पक्षी इंसान हर तरह की भौतिक वस्तु आकाशीय वस्तु है सृष्टि की रचना में जो भी सहायक है चाहे वह तूफान हो भूचाल हो आग हो पानी हो धरती हो आकाश हो शरीर के हर अंग के चालन के लिए उत्तरदाई हैं अगर हम इन सभी गणों को नहीं समझ पाएंगे और उनका आदर नहीं करेंगे अगर हमें उनका ज्ञान नहीं होगा तो हमें परम ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है गणों की एक-एक कर हम वंदना करें उससे अच्छा है कि हम इन गणों के महानायक की वंदना करके ही हर तरह के अड़चन विघ्नों अविद्या तथा अहंकार आदि के ऊपर विजय प्राप्त कर लें

और यही आध्यात्मिक रूप से भगवान गणेश की सत्यता है



गानचतुराय गानप्राणाय गानान्तरात्मने ।

गानोत्सुकाय गानमत्ताय गानोत्सुकमनसे ।

गुरुपूजिताय गुरुदेवताय गुरुकुलस्थायिने ।

गुरुविक्रमाय गुह्यप्रवराय गुरवे गुणगुरवे ।

गुरुदैत्यगलच्छेत्रे गुरुधर्मसदाराध्याय ।

गुरुपुत्रपरित्रात्रे गुरुपाखण्डखण्डकाय ।

गीतसाराय गीततत्त्वाय गीतगोत्राय धीमहि ।

गूढगुल्फाय गन्धमत्ताय गोजयप्रदाय धीमहि ।

गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।

एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।

गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥


गान चतुराय= वह जो गीत और संगीत में परम निपुण है वह चतुर है

गान प्राणाय= वह जो गीत और संगीत के जीवन है अर्थात प्राण हैं

गान अन्तरात्मने= वह जो गीत व संगीत के आत्मा है


गान उत्सुकाय=जो गीत व संगीत के लिए हमेशा उत्सुक हैं

गान मत्ताय=वह जो गीत वह संगीत के लिए मदमस्त है अर्थात दीवाने

गान उत्सुक मनसे =वह जो दिलो दिमाग से सदैव गीत व संगीत के लिए उत्सुक हैं


गुरुपूजिताय= गुरुओं के परम गुरु जिनकी सर्वप्रथम पूजा होती हो

गुरुदेवताय=वह गुरु जो गुरुओं के देव हैं

गुरुकुलस्थायिने =वह जो परिवार के मुखिया हैं


गुरु विक्रमाय= वह जो परम शक्तिशाली है

गुह्यप्रवराय =वह जो हर प्रकार के मायाजाल से मुक्त है

गुरवे=वह जो परम ज्ञानी हैं

गुणगुरवे=अपने गुणों के कारण जो सर्व श्रेष्ठ हैं और सर्वोपरि है ।

गुरु दैत्य गलच्छेत्रे=वह जो दैत्यों के नाश करने में सबसे प्रमुख है

गुरु धर्म सदा आराध्याय =वह जो धर्म के मुख्य धूरी है


गुरुपुत्रपरित्रात्रे=वह जो संतानों के रक्षक हैं

गुरुपाखण्डखण्डकाय =जो हर प्रकार के पाखंड का खंडन करते हैं

गीतसाराय=वह जो गीत संगीत के सार हैं


गीततत्त्वाय=जो गीत संगीत के तत्व है

गीतगोत्राय =वह जो गीत संगीत और ध्यान के उन्नति कारक हैं उनके गोत्र हैं

गूढगुल्फाय= वह जिनके ढकने गहरे हैं


गन्धमत्ताय =वह जो सुगंध से मदमस्त हैं

गोजयप्रदाय=वह जो जय प्रदान करने वाले हैं

गुणातीताय=वह जो हर गुणों से भी श्रेष्ठ हैं


गुणाधीशाय =वह जो हर गुणों के संचालक है

गुणप्रविष्टाय=वह जो गुरु को कहीं भी प्रवेश कर आते हैं

एकदंताय=वह जो एक दंत है


वक्रतुण्डाय=वाह जिनका उधर गोल है

गौरीतनयाय=वह जो गौरी के पुत्र हैं

गजेशानाय=वह जो सभी गजों में श्रेष्ठ हैं


भालचन्द्राय=जिनके माथे पर चंद्रमा है

श्रीगणेशाय=वह जो श्री गणेश है


ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी आदिशक्ति मां के शरीर से छूटे हुए उपटन से भगवान गणेश की उत्पत्ति हुई भगवान गणेश जो रिद्धि और सिद्धि दोनों के ही परमेश्वर है यह सिद्ध करता है कि रिद्धि और सिद्धि दोनों ही अंत में इस ब्रह्म के धूल के कण में ही मिल जाते हैं और आदि शक्ति से ही उत्पन्न होते हैं और आदिशक्ति में ही समा जाते हैं

रिद्धि मानव के जीवन में समृद्धि और प्रचुरता लाती है सभी भौतिक सुख और संपन्नता जो भी हमारी पांचों ज्ञानेंद्रियों से महसूस होता है वृद्धि की कृपा से पूर्ण होता है सिद्धि आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है ऐसी शक्ति जो पांचों ज्ञानेंद्रियों से भी परे है सिद्धि हमें अतिंद्रीय दृष्टि अतिंद्रीय श्रवण और हमारे सोच और समझ को भी विस्तृत आयाम प्रदान करती है

रिद्धि सिद्धि माया का ही एक रूप है यह दोनों ही क्षणभंगुर है और हमेशा बने नहीं रह सकते इसीलिए साधारण मानव को इन चीजों के प्राप्त करने के लिए अपनी जिंदगी के मूल्यवान समय को बर्बाद नहीं करना चाहिए और ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्म के विस्तृत रूप को समझना चाहिए


श्री गणेश को हम अनेक नामों से पुकारते हैं गणपति कहे या विनायक कहें या द्वेमातुरा एकदंताय विघ्नेश्वर लम्बोदर गजानना आदि और भी बहुत से नाम हिंदू देवताओं में सबसे अधिक पूजे जाने वाले देवता हैं श्री गणेश हिंदुस्तान ही नहीं नेपाल श्रीलंका थाईलैंड बाली बांग्लादेश जैसे देशों में इनकी पूजा होती है फीजी मारीशस ट्रिनिडेड ट्रोबेगो जैसे देशों में भी गणेश की पूजा होती है क्योंकि यहां भारतीय बहुत ज्यादा संख्या में बस गए हैं

हिंदू धर्म ही नहीं गणेश जी की पूजा जैन धर्म और बौद्ध धर्म में भी होती हैं

श्री गणेश विघ्नहर्ता है कला और विज्ञान के देवता है बुद्धि और विद्या के देवता किसी कार्य को शुरू करने के पहले चाहे वह कार्य छोटा हो या बड़ा हम श्री गणेश का नाम लेते हैं यहां तक कि हमारे हिंदू धर्म में कार्य को शुरू करो ऐसा ना कह कर हम कह डालते हैं चलो कार्य का श्रीगणेश किया जाए जब पहली बार शब्द को शुरू करते हैं बच्चे और लिखना सीखना का अभ्यास करते हैं तभी लोग भगवान गणेश को भी याद करते हैं



पहली ईशा पूर्व से ही भगवान गणेश की पूजा आराधना का पता चलता है

गुप्त के राज्य काल के समय में अर्थात चौथी और पांचवी शताब्दी के समय गणेश की पूजा बहुत ज्यादा की जाती थी वेदों में और वेदों के पहले की भी कथाओं में भगवान गणेश का उल्लेख मिलता है

गणेश पुराण में पुराण में मुद्गल पुराण में गणपति अथर्वाशीर्षा में ब्रह्म पुराण में और ब्रह्मानंद पुराण में गणेश का उल्लेख मिलता है

कला के क्षेत्र में गणेश को कलाकार अपनी कला की हर कल्पना में चित्रित करते रहे हैं चाहे वह खड़े गणेश में नाचते गणेश या वीरता का काम करते हुए गणेश या एक बच्चे की तरह खेलते हुए गणेश हो या कहीं ऊंचाई पर बैठे हुए गणेश जय श्री कल्पना हो जैसा भी रंग समझ में आया जैसी भी आकृति लोगों को पसंद आयी कलाकारों ने गणेश को उसमें चित्रित किया सिंधु घाटी की सभ्यता में भी गणेश भगवान की कुछ जानकारियों के कुछ सबूत मिले हैं

भगवान गणेश के चित्र छठी शताब्दी से मिलने शुरू हुए लेकिन उससे भी पहले अफगानिस्तान के पूर्वी तरफ गणेश भगवान की मूर्ति मिली है जो सूर्य देव और शिव जी के साथ हैं माना जा रहा है कि यह चौथी शताब्दी का है मध्य प्रदेश की उदयगिरी की गुफाओं में भी गणेश भगवान की मूर्तियां मिली हैं ९००ई और 12००ई के मध्य में गणेश की पूजा का विधान देखने को मिला एक बात जो सभी मूर्तियों में एक जैसी रही वह है गज यानी हाथी का सर एक बड़ा सा पेट और चार भुजाएं बाए हाथ में उन्होंने अपनी ही चोर को पकड़ा हुआ है और दाएं हाथ में उनके लड्डू रखा हुआ दिखाया जाता है एलोरा की गुफाओं में जो की सातवीं शताब्दी के लगभग की मानी जाती है गणेश भगवान की मूर्तियां मिली है जिनके एक हाथ में पाश है और एक हाथ में अंकुश पुरानी गणेश मूर्तियों की तुलना में आज के गणेश मूर्तियों में एक ही बस अंतर आया है कि जहां पुरानी मूर्तियों में एक हाथ में गणेश भगवान को अपना ही टुटा दांत पकड़ा हुआ दिखाया जाता था वहीं आज की गणेश मूर्तियों में भगवान जी का हाथ वर मुद्रा में अपनी भक्तों की तरफ उठा हुआ दिखाया जाता है






हेरम्‍ब, भगवान गणपति का एक नाम है । सिंह पर सवार पंचमुखी भगवान गणपति के इस विग्रह की पूजा तंत्रसाधना में प्रचलित हैै इस कारण सामान्‍य मन्‍दिरों में भगवान के इस रूप के दर्शन उपलब्‍ध नहीं होते ।


बीकानेर में भी एक हेरम्‍ब गणपति का एक मन्‍दिर हैै । यह मन्‍दिर जूनागढ़ में ऊपरी मंजिल में स्‍थित है । मन्‍दिर राजपरिवार के प्रबन्‍ध में है और वर्तमान में आम जन को वहां पर जाने व दर्शन की अनुमति नहीं हैै ।





पार्वती के द्वारा गणेश का बनाया जाना और भगवान शिव के रूप से उनका सर धड़ से अलग होना और फिर एक हाथी का सरला करके लगाए जाने वाली कथा के अलावा भी कई कुछ पौराणिक कथाओं में यह बात कही गई कि उनका जन्म ही गज के मुख के साथ हुआ था वह माता पार्वती के पुत्र ना होकर एक और देवी मालिनी के पुत्र हैं जिन्होंने पार्वती मां के स्नान काजल जो कि नदी में चला गया था उसी पी लिया था और उसके बाद ही गणेश भगवान का जन्म हुआ और गणेश भगवान को शिव और पार्वती ने मिलकर जंगल में खो जाता कहीं यह कथा भी मिलती है कि भगवान शिव ने ही गणेश भगवान को एक बड़ी सी पेट और हाथी के सर के साथ बनाया था क्योंकि उस समय उन्हें बड़ी हंसी आ रही थी

वही एक और यह भी कहा गया है कि बहुत ही खूबसूरत रचना की थी गणपति की शिव जी ने लेकिन तीनो लोक में हाहाकार मच गया कि इतना ज्यादा संपूर्ण खूबसूरत जिसमें सारे गुण भी होंं जिनमें सारी शक्तियां भी हो ऐसा अगर कोई देव हो तो फिर दूसरे देवों को कौन पूछेगा और इस कारण जब सारे देव परेशान हो गए तो शिव जी ने सर गज का बना दिया और लम्बोदर बना दिया ताकि अन्य देवों को आप कोई परेशानी ना हो




ब्रह्मानंद पुराण के अनुसार गणेश भगवान के लंबोदर होने का कारण है कि उनकी उधर में पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है भूत वर्तमान और भविष्य उनके उधर में ही मौजूद है

मुद्गल पुराण के अनुसार अपने वक्रतुंड अवतार में श्री गणेश ने शेर को अपना वाहन बनाया है अपने विकट अवतार में उन्होंने मोर को अपना वाहन बनाया है विध्नराजा के अवतार में उन्होंने शेषनाग को अपना वाहन बनाया है परंतु गणेश जी का वाहन एक डिंग नामक मूषक ही सबसे लोकप्रिय वाहन है चूहा तमोगुण का देव तक है और हर खुद और नकारात्मकता पर गणेश जी सवारी करते हैं अर्थात उसे अपने कब्जे में रखते हैं चूहे की तरह हमारी तृष्णा इच्छाएं आकांक्षा है हमें अंदर ही अंदर खोखला करती है और भगवान गणेश इन्हीं सब बुरे गुण पर विजय प्राप्त करने की शिक्षा देते हैं दूसरी और हर तरह की काट छांट करना चोरी करना आदि चूहे की निशानी है और गणपति इन सब विध्नों को दूर कर देते हैं चूहा जिस तरह किसी भी गुप्त से गुप्त स्थान पर पहुंच जाता है उसी तरह भगवान गणेश भी हर गुप्त से गुप्त भेद के जानकार हैं

कुंडलिनी योग के अनुसार पुराणों में ऐसा बताया गया है कि भगवान गणेश मूलाधार चक्र पर आसीन देवता है जो बाकी के सभी चक्रों की ऊर्जा को व्यवस्थित करते हैं और जीवन चक्र को सुचारू रूप से चलाने में मदद करते हैं

ज्योतिषी में भगवान गणेश को केतु का देवता माना जाता है


श्री गणेश की भाई हैं श्री कार्तिकेय

कुछ कथाओं में भगवान गणेश को ब्रह्मचारी बताया गया है वही कुछ कथाओं में बुद्धि रिद्धि और सिद्धि गणेश भगवान की पत्नियां है गणेश के बहुत कम ही चित्रण उनकी पत्नियों के साथ मिलते हैं अधिकतर पूजन के समय में सरस्वती और गणेश को एक साथ रखा जाता है और मां लक्ष्मी और गणेश भगवान को एक साथ रखा जाता है बंगाल में तो केले के पेड़ जिसे कोला बो कहते हैं उन्हें गणेश भगवान के साथ रख कर पूजा की जाती है पौराणिक कथाओं में गणेश भगवान की दो बच्चों की भी व्याख्या मिलती है उनके नाम शुभ और लाभ हैं एक पौराणिक कथा के अनुसार जिसके बारे में कि ज्यादा तथ्य नहीं मिलती फिर भी संतोषी माता को गणेश भगवान की बेटी के रूप में बताया गया है


गणेश भगवान की पूजन में जहां मोदक या लड्डू या मिठाइयों को रखा जाता है वही उनका रंग लाल होने के कारण लाल चंदन से भी उनकी पूजा होती है और लाल फूल से पूजा होती है दूर्वा घास अर्थात दूब घास से भी उनकी पूजा होती है

भादो की शुक्ल पक्ष में गणेश चतुर्थी मनाया जाता है और माघ की चतुर्थी में गणेश जयंती मनाया जाता है

गणेश चतुर्थी एक त्योहार है जो कि भादो के महीने में पड़ता है और यह 10 दिनों तक चलता है इसमें लोग भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्ति बनाकर उन्हें अपने घर लाते हैं और ऐसामूर्तियों को पानी में विसर्जित कर दिया जाता है

स्वतंत्रता संग्राम के समय में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी जो कि उससे पहले घरों में व्यक्तिगत रूप से पूजन की जाती थी उसे जनसाधारण के लिए एक जन उत्सव के रूप में बनाकर उसका स्वरूप ही बदल दिया उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सभी लोगों को जात पात भूल कर एकजुट होकर आगे आने के लिए किया बाल गंगाधर तिलक ही सर्वप्रथम पंडाल बना कर और उसमें एक बड़ी सी गणेश भगवान की मूर्ति स्थापित कर 10 दिनों का यह जनोंउत्सव का आयोजन किया था शुरुआत के समय में यह त्योहार महाराष्ट्र तक ही सीमित था धीरे-धीरे यह पूरे हिंदुस्तान ही नहीं अब तो विश्व के कोने-कोने में मनाया जाता है

1. सिद्धि विनायक गणेश मंदिर मुंबई

अष्टविनायक मंदिर महाराष्ट्र

उज्जैन में बड़ा गणेश का मंदिर भी चमत्कारिकक है। लाल रंग के बड़े से गणेश पत्नियों रिद्धि और सिद्धि के साथ यहां विराजमान हैं।

खजराना गणेश मंदिर, इंदौर : मध्यप्रदेश में चिंतामण गणपति की तरह इंदौर का खजराना गणेश मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है। वक्रतुंड श्रीगणेश की 3 फुट प्रतिमा चांदी का मुकुट धरे रिद्धी-सिद्धी के साथ विराजमान हैं जिनका नित्य पूजन विधि-विधान से होता है।

3. रॉकफोर्ट उच्ची पिल्लयार मंदिर, तमिलनाडु :

. कनिपकम विनायक मंदिर, चित्तूर

मधुर महागणपति मंदिर, केरल :

डोडा गणपति मंदिर, बेंगलुरु

8. रणथंबौर गणेश मंदिर, राजस्‍थान :भक्‍तजन यहां गणेशजी के त्रिनेत्र स्‍वरूप के दर्शन करने आते हैं।

गणेश टोक मंदिर, गंगटोक (सिक्किम)


10. डोडीताल, उत्तराखंड : उत्तरकाशी जिले के डोडीताल को गणेशजी का जन्म स्थान माना जाता है।


बात उस समय की है जब महर्षि वेदव्यास महाभारत नाम के महाकाव्य की रचना प्रारंभ करने जा रहे थे। अपने महाकाव्य के लिए वे एक ऐसा लेखक चाह रहे थे, जो उनके विचारों की गति को बीच में बाधित ना करे। इस क्रम में उन्हें भगवान गणेश की याद आई और उन्होंने आग्रह किया कि श्री गणेश उनके महाकाव्य के लेखक बनें। गणेश जी ने उनकी बात मान ली, लेकिन साथ ही एक शर्त रख दी।

गणेश जी की शर्त थी कि महर्षि एक क्षण के लिए भी कथावाचन में विश्राम ना लेंगे। यदि वे एक क्षण भी रूके, तो गणेश जी वहीं लिखना छोड़ देंगे। महर्षि ने उनकी बात मान ली और साथ में अपनी भी एक शर्त रख दी कि गणेश जी बिना समझे कुछ ना लिखेंगे। हर पंक्ति लिखने से पहले उन्हें उसका मर्म समझना होगा। गणेश जी ने उनकी बात मान ली।

इस तरह दोनों ही विद्वान जन एक साथ आमने-सामने बैठकर अपनी भूमिका निभाने में लग गए। महर्षि व्यास ने बहुत अधिक गति से बोलना शुरू किया और उसी गति से भगवान गणेश ने महाकाव्य को लिखना जारी रखा। इस गति के कारण एकदम से गणेश जी की कलम टूट गई, वे ऋषि की गति के साथ तालमेल बनाने में चूकने लगे। इस स्थिति में हार ना मानते हुए गणेश जी ने अपना एक दांत तोड़ लिया और उसे स्याही में डुबोकर लिखना जारी रखा।

इसके साथ ही वे समझ गए कि उन्हें अपनी लेखन की गति पर थोड़ा अभिमान हो गया था और वे ऋषि की क्षमता को कम कर आंक रहे थे। महर्षि ने उनका घमंड चूर करने के लिए ही अत्यंत तीव्र गति से कथा कही थी। वहीं ऋषि भी समझ गए कि गजानन की त्वरित बुद्धि और लगन का कोई मुकाबला नहीं है। इसी के साथ उन्होंने गणेश जी को नया नाम एकदंत दिया।

दोनों ही पक्षों द्वारा एक-दूसरे की शक्ति, क्षमता और बुद्धिमतता को स्वीकार किए जाने के बाद समान लगन और उर्जा के साथ महाकाव्य के लेखन का कार्य होने लगा। कहा श् जाता है कि इस महाकाव्य को पूरा होने में तीन वर्ष का समय लगा। इन तीन वर्षों में गणेश जी ने एक बार भी ऋषि को एक क्षण के लिए भी नहीं रोका, वहीं महर्षि ने भी शर्त पूरी की।

महाकाव्य के दौरान जब भी उन्हें तनिक विश्राम की आवश्यकता होती, वे कोई बहुत कठिन अंतरा बोल देते। शर्त के अनुसार गणेश जी बिना समझे कुछ लिख नहीं सकते थे। इसीलिए जितना समय गणेश जी उस अंतरे को समझने में लेते, उतनी देर में ऋषि विश्राम कर लेते। माना जाता है कि महाभारत महाकाव्य कई अंतरे कहीं गुम हो गए हैं। इसके बावजूद आज भी महाभारत में 1 लाख अंतरे हैं।