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Om namah shivaya

Updated: Aug 29

ॐ नमः शिवाय

अर्थ "भगवान शिव को नमस्कार"

शिव पञ्चाक्षर मन्त्र या पञ्चाक्षर मन्त्र भी कहा जाता है, जिसका अर्थ "पाँच-अक्षर" मन्त्र (ॐ को छोड़ कर) है। यह मन्त्र श्री रुद्रम् चमकम् और रुद्राष्टाध्यायी में "न", "मः", "शि", "वा" और "य" के रूप में प्रकट हुआ है। श्री रुद्रम् चमकम्, कृष्ण यजुर्वेद का अंश है और रुद्राष्टाध्यायी, शुक्ल यजुर्वेद का भाग है।

यह मन्त्र के मौखिक या मानसिक रूप से दोहराया जाते समय मन में भगवान शिव की अनन्त व सर्वव्यापक उपस्थिति पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। परम्परागत रूप से इसे रुद्राक्ष माला पर 108 बार दोहराया जाता है। इसे जप योग कहा जाता है। इसे कोई भी गा या जप सकता है

यह मन्त्र प्रार्थना, परमात्मा-प्रेम, दया, सत्य और परमसुख जैसे गुणों से जुड़ा हुआ है। सही ढंग से मन्त्र जप करने से यह मन को शान्त, आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि और ज्ञान लाता है । यह भक्त को शिव के पास भी लाता है। परम्परागत रूप से, यह स्वीकार किया गया है कि इस मन्त्र में समस्त शारीरिक और मानसिक बीमारियों को दूर रखने के शक्तिशाली चिकित्सकी गुण हैं। इस मन्त्र के भावपूर्ण पाठ करने से दिली शान्ति और आत्मा को प्रसन्नता मिलती है। पाँच अक्षरों का दोहराना शरीर के लिए साउण्ड थैरेपी और आत्मा के लिए अमृत के भाँति है।


शंकर या महादेव नाम से पूजते हैं वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव हैं। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधर आदि अनेकों नामों से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है। वेद में इनका नाम रुद्र है। इनकी अर्धांगिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं, तथा पुत्री अशोक सुंदरी हैं।

अशोक सुंदरी के जन्म की कथा पद्म पुराण में बताई गई है जो नहुष नामक राजा के चरित्र वर्णन की इकाई है। एक बार माता पार्वती द्वारा विश्व में सबसे सुंदर उद्यान लाने के आग्रह से भगवान शिव पार्वती को नंदनवन ले गये, वहाँ माता को कल्पवृक्ष से लगाव हो गया और उन्होने उस वृक्ष को ले लिया। कल्पवृक्ष मनोकामना पूर्ण करने वाला वृक्ष है, पार्वती नें अपने अकेलेपन को दूर करने हेतु उस वृक्ष से यह वर माँगा कि उन्हे एक कन्या प्राप्त हो, तब कल्पवृक्ष द्वारा अशोक सुंदरी का जन्म हुआ। माता पार्वती नें उस कन्या को वरदान दिया कि उसका विवाह देवराज इंद्र जितने शक्तिशाली यूवक से होगा। एक बार अशोक सुंदरी अपने दासियों के संग नंदनवन में विचरण कर रहीं थीं तभी वहाँ हुंड नामक राक्षस का प्रवेश हुआ जो अशोक सुंदरी के सुंदरता से मोहित हो गया तथा विवाह का प्रस्ताव किया, तब उस कन्या ने भविष्य में उसके पूर्वनियत विवाह के संदर्भ में बताया। राक्षस नें कहा कि वह नहूष को मार डालेगा तब अशोक सुंदरी ने राक्षस को श्राप दिया कि उसकी मृत्यु नहूष के हाथों होगी। उस राक्षस नें नहुष का अपहरण कर लिया जिससे नहूष को हुंड की एक दासी ने बचाया। महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में नहूष बड़ा हुआ तथा आगे जाकर उसने हुंड का वध किया।

बाद में नहूष तथा अशोक सुंदरी का विवाह हुआ तथा वह ययाति जैसे वीर पुत्र तथा सौ रूपवती कन्याओं की माता बनीं। इंद्र के अभाव में नहूष को ही आस्थायी रूप से इंद्र बनाया गया, उसके घमंड के कारण उसे श्राप मिला तथा इसीसे उसका पतन हुआ। बादमें इंद्र नें अपनी गद्दी पुन: ग्रहण की।)


आरण्य संस्कृति

भारत के आदिवासियों की संस्कृति थी हीं भारत की मूल संस्कृत है , इस संस्कृति में पेड़ - पोधो और जीवो को भगवान माना जाता है , आदिवासी संस्कृति प्रकृति से जुड़ी हुई है इसका विकासक्रम सिंधु घाटी सभ्यता के समय चल रहा था ।

भगवान शिव मूलतः आदिवासियों की से संबंधित थे ,ऐसा इतिहास के अध्ययन से पता चलता है सिंधु घाटी सभ्यता से भगवान शिव से जुड़े शाक्ष प्राप्त हुए , भगवान शिव का एक रूप भील किरात का रहा है । खुद भील खुद को भगवान शिव के वंशज मानते है

भगवान शिव आदिवासियों की संस्कृति से ही अन्य लोगो की संस्कृति तक पहुंचे

जो आगे चल कर सनातन धर्म में (शैव धर्म) हुआ


भगवान शिव तथा उनके अवतारों को मानने वालों को शैव कहते हैं। महाभारत में माहेश्वरों के नाम से शैव सम्प्रदाय का उल्लेख मिलता है

शैवमत का मूलरूप ॠग्वेद में रुद्र की आराधना में हैं।12 रुद्रों की व्याख्या की गई है


अथर्ववेद में शिव को भव, शर्व, पशुपति और भूपति कहा जाता है।

पाशुपत संप्रदाय शैवों का सबसे प्राचीन संप्रदाय है।

कापालिक संप्रदाय के ईष्ट देव भैरव थे, इस सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र 'शैल' नामक स्थान था।

कालामुख संप्रदाय के अनुयायिओं को शिव पुराण में महाव्रतधर कहा जाता है। इस संप्रदाय के लोग नर-कपाल में ही भोजन, जल और सुरापान करते थे और शरीर पर चिता की भस्म मलते थे।

इस संप्रदाय को वीरशिव संप्रदाय भी कहा जाता था।

दसवीं शताब्दी में मत्स्येंद्रनाथ ने नाथ संप्रदाय की स्थापना की, इस संप्रदाय का व्यापक प्रचार प्रसार बाबा गोरखनाथ के समय में हुआ।

दक्षिण भारत में शैवधर्म चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव और चोलों के समय लोकप्रिय रहा।


पल्लवकाल में शैव धर्म का प्रचार प्रसार नायनारों ने किया।

ऐलेरा के कैलाश मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूटों ने करवाया।

चोल शालक राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर शैव मंदिर का निर्माण करवाया था।

कुषाण शासकों की मुद्राओं पर शिव और नन्दी का एक साथ अंकन प्राप्त होता है।

शिव पुराण में शिव के दशावतारों के अलावा अन्य का वर्णन मिलता है।

शैव ग्रंथ इस प्रकार हैं:

(i) श्‍वेताश्वतरा उपनिषद (ii) शिव पुराण (iii) आगम ग्रंथ (iv) तिरुमुराई

शैव तीर्थ इस प्रकार हैं:

(i) बनारस (ii) केदारनाथ (iii) सोमनाथ (iv) रामेश्वरम (v) चिदम्बरम (vi) अमरनाथ (vii) कैलाश मानसरोवर

शैव सम्‍प्रदाय के संस्‍कार इस प्रकार हैं:

(i) शैव संप्रदाय के लोग एकेश्वरवादी होते हैं।

(ii) इसके संन्यासी जटा रखते हैं।

(iii) इसमें सिर तो मुंडाते हैं, लेकिन चोटी नहीं रखते।

(iv) इनके अनुष्ठान रात्रि में होते हैं।

(v) इनके अपने तांत्रिक मंत्र होते हैं।

(vi) यह निर्वस्त्र भी रहते हैं, भगवा वस्त्र भी पहनते हैं और हाथ में कमंडल, चिमटा रखकर धूनी भी रमाते हैं।

(vii) शैव चंद्र पर आधारित व्रत उपवास करते हैं।

(viii) शैव संप्रदाय में समाधि देने की परंपरा है।

(ix) शैव मंदिर को शिवालय कहते हैं जहां सिर्फ शिवलिंग होता है।

(x) यह भभूति तीलक आड़ा लगाते हैं।

शैव साधुओं को नाथ, अघोरी, अवधूत, बाबा, औघड़, योगी, सिद्ध कहा जाता है।


शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं(योग को जानने वाला या योग का अभ्यास करने वाला योगी कहलाता है।) और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है।

लिंगायत समुदाय दक्षिण में काफी प्रचलित था। इस संप्रदाय के लोग शिव लिंग की उपासना करते थे।

महाभारत के अनुशासन पर्व से भी लिंग पूजा का वर्णन मिलता है।

लिंगपूजा का पहला स्पष्ट वर्णन मत्स्यपुराण में मिलता है।

शिवलिंग उपासना का प्रारंभिक पुरातात्विक साक्ष्य हड़प्पा संस्कृति के अवशेषों से मिलता है। अर्थार्त प्रतीक, निशान या चिह्न) इसे लिंगा,पार्थिव-लिंग,लिंगम् या शिवा लिंगम् भी कहते हैं। यह हिंदू भगवान शिव का प्रतिमाविहीन चिह्न है। यह प्राकृतिक रूप से स्वयम्भू व अधिकतर शिव मंदिरों में स्थापित होता है।शिवलिंग को सामान्यतः गोलाकार मूर्तितल पर खड़ा दिखाया जाता है जिसे,पीठम् या पीठ कहते हैं।

शिवलिंग का ऊपरी अंडाकार भाग परशिव का प्रतिनिधित्व करता है व निचला हिस्सा यानी पीठम् पराशक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। परशिव परिपूर्णता में भगवान शिव मानव समझ और समस्त विशेषताओं से परे एक परम् वास्तविकता है। इस परिपूर्णता में भगवान शिव निराकार, शाश्वत और असीम है। पराशक्ति परिपूर्णता में भगवान शिव सर्वव्यापी, शुद्ध चेतना, शक्ति और मौलिक पदार्थ के रूप में मौजूद है।

शिव की उपासना के लिए हम उन्हें एक रूप देते हैं लेकिन असलियत यह है कि शिव का कोई रूप नहीं वह निराकार है

सामान्यतः पत्थर, धातु व चिकनी मिट्टी से बना स्तम्भाकार या अंडाकार(अंडे के आकार का) शिवलिंग भगवान शिव की निराकार सर्वव्यापी वास्तविकता को दर्शाता है। भगवान शिव का प्रतीक शिवलिंग - सर्वशक्तिमान निराकार प्रभु की याद दिलाता है।

सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई के दौरान कालीबंगा और अन्य खुदाई के स्थलों पर मिले पकी मिट्टी के शिवलिंगों से प्रारंभिक शिवलिंग पूजन के सबूत मिले हैं। सबूत यह दर्शाते हैं कि शिवलिंग की पूजा 3500 ईसा पूर्व से 2300 ईसा पूर्व भी होती थी।[

अथर्ववेद के स्तोत्र में एक स्तम्भ की प्रशंसा की गई है, संभवतः इसी से शिवलिंग की पूजा शुरू हुई हो। लिङ्ग पुराण में शिव की महिमा का गुणगान किया गया है।

शिव पुराण में शिवलिंग की उत्पत्ति का वर्णन अग्नि स्तंभ के रूप में किया गया है

लिंगोद्भव कथा में परमेश्वर शिव ने स्वयं को अनादि व अनंत अग्नि स्तंभ के रूप में ला कर भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु को अपना ऊपरला व निचला भाग ढूंढने के लिए कहा और उनकी श्रेष्ठता तब साबित हुई जब वे दोनों अग्नि स्तंभ का ऊपरला व निचला भाग ढूंढ नहीं सके।स्कन्द पुराण में भी है, इसमें यह कहा गया है "अनंत आकाश (वह महान शून्य जिसमें समस्त ब्रह्मांड वसा है) शिवलिंग है और पृथ्वी उसका आधार है। समय के अंत में, समस्त ब्रह्मांड और समस्त देवता व इश्वर शिवलिंग में विलीन हो जाएँगें।" महाभारत में द्वापर युग के अंत में भगवान शिव ने अपने भक्तों से कहा कि आने वाले कलियुग में वह किसी विशेष रूप में प्रकट नहीं होगें परन्तु इसके बजाय वह निराकार और सर्वव्यापी रहेंगे।

अथर्ववेद के इन निम्न श्लोकों में स्तंभ का उल्लेख हुआ है:

शुद्धतम शिवलिंग स्फटिक (स्फटिक शिवलिंग) से बना होता है, यह पत्थर मनुष्य द्वारा तराशा नहीं जाता है परन्तु प्राकृति द्वारा बनाया गया है। स्फटिक सैकड़ों, हजारों या लाखों वर्षों में अणुओं के इकट्ठा होने पर बनता है। इसका बनना असीम रूप से धीरे धीरे विकसित होने वाले जीवित शरीर की तरह है। प्रकृति की इस तरह की सृष्टि स्वयं ही पूजने योग्य चमत्कार है।"हिंदू ग्रंथ स्फटिक को शिवलिंग के लिए उच्चतम प्रदार्थ मानते हैं।

शैव सम्प्रदाय के कारणा आगम के छठवें श्लोक में कहा गया है कि "एक अस्थायी शिवलिंग 12 अलग-अलग सामग्री: रेत, चावल, पकाए भोजन, नदी की मिट्टी, गाय के गोबर, मक्खन, रूद्राक्ष बीज, राख, चंदन, दूब घास, फूलों की माला या शीरा द्वारा बनाया जा सकता है।"पन्ना शिवलिंग; पन्ने नामक हरे रंग के कीमती रत्न से बनाया जाता है।

पारद शिवलिंग; जमे हुए ठोस पारे द्वारा बनाया जाता है।

स्फटिक शिवलिंग; रंगहीन या सफेद खनिज (स्फटिक) से बनाया जाता है।

कदावुल मंदिर में रखा हुआ स्फटिक शिवलिंग।

अमरनाथ गुफा में शिवलिंग।

पश्चिमी हिमालय में अमरनाथ नामक गुफा में प्रत्येक शीत ऋतु में गुफा के तल पर पानी टपकाने से बर्फ का शिवलिंग सृजित होता है। यह तीर्थयात्रियों में बहुत लोकप्रिय है।

कदावुल मंदिर में 320 किलोग्राम, 3 फुट उच्चा स्वयंभू स्फटिक शिवलिंग स्थापित है। भविष्य में इस स्फटिक शिवलिंग को ईराइवन मंदिर में स्थापित किया जाएगा। यह सबसे बड़ा ज्ञात स्वयंभू स्फटिक शिवलिंग है।हिंदू ग्रंथ स्फटिक को शिवलिंग के लिए उच्चतम प्रदार्थ मानता है।

शिवलिंग 6,543 मीटर (21,467 फीट) उच्चा, उत्तराखंड (हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र) में स्थित पहाड़ है। यह गंगोत्री हिमानी के पास पिरामिड के रूप में उभरता दिखता है। गंगोत्री हिमानी से गोमुख की हिंदू तीर्थयात्रा करते समय यह विशेष कोणों से शिवलिंग जैसा दिखता है।

आंध्र प्रदेश की बोरा गुफाओं में भी प्राकृतिक स्वयंभू शिवलिंग मौजूद हैं।

बाणलिंग नर्मदा नदी के बिस्तर पर पाए जाते हैं।

छत्तीसगढ़ का भूतेश्वर शिवलिंग एक प्राकृतिक चट्टान है जिसकी प्रत्येक बीतते वर्ष के साथ ऊंचाई बढ़ रही है। अरुणाचल प्रदेश का सिद्धेश्वर नाथ मंदिर का शिवलिंग सबसे ऊंच्चा प्राकृतिक शिवलिंग माना जाता है।




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